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इन महिलाओं ने अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास से नई ऊंचाइयों को छुआ

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नई दिल्ली। आज के विशेष कार्यक्रम में हम आपको मिलवाएंगे ऐसी महिलाओं से, जिन्होंने अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास से नई ऊंचाइयों को छुआ है। गंज बासौदा के मॉडल पब्लिक स्कूल की प्राचार्या हर्षिता नाहर जैन की प्रेरणादायक यात्रा, भोपाल की अल्का शर्मा का खदयोत नेचुरल्स को प्राकृतिक उत्पादों का प्रतीक बनाना, मशहूर फैशन डिज़ाइनर अल्पा रावल के डिज़ाइनर स्टूडियो “दिव्य फल” की सफलता, मिस एमपी 2024 भारती पंवार का व्यक्तित्व विकास पर जोर और बैंगलोर की अनु छाबड़ा का जैविक खेती में अनोखा सफर—ये सभी कहानियां आपको प्रेरणा देने के लिए तैयार हैं।

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कर्नाटक के बैंगलोर से एंटरप्रेन्योर अनु छाबड़ा ने अपने छोटे से घर की बालकनी से जैविक खेती की शुरुआत की थी। शुरुआती दिनों में उन्होंने केवल सजावटी पौधों पर ध्यान दिया, लेकिन धीरे-धीरे सब्जियां, फूल, और फल उगाने का जुनून बढ़ता गया। अनु का मानना है कि खेती के लिए बड़ी जमीन जरूरी नहीं है, बल्कि छोटी-सी जगह में भी काफी कुछ उगाया जा सकता है।

अनु ने ऑयस्टर मशरूम की खेती को भी अपनाया, जो उन्होंने कोविड के दौरान सीखा। उन्होंने बताया कि कैसे पराली का इस्तेमाल मशरूम उगाने और जैविक खाद तैयार करने में किया जाता है। यह न केवल स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है, बल्कि एक स्थायी खेती का उदाहरण भी है। उनकी मशरूम की पैदावार पूरे भारत में सप्लाई की जाती है, और इसे सन ड्राई करने के बाद इसका विटामिन डी का स्तर भी बढ़ाया जाता है।

अनु ने अपनी पहल को सोशल मीडिया, गार्डनिंग कम्युनिटीज़ और अपने क्लाइंट्स के माध्यम से फैलाया है। आने वाले समय में उनका लक्ष्य लोगों को छोटे स्तर पर खेती के लिए प्रेरित करना और ऑयस्टर मशरूम को एक स्वस्थ प्रोटीन स्रोत के रूप में लोकप्रिय बनाना है। उनका सपना इसे बड़े स्तर पर ले जाकर अधिक से अधिक लोगों को जागरूक करना है।

जबलपुर की मिस एमपी 2024 और पर्सनैलिटी ग्रूमर भारती पंवार का मानना है कि हर व्यक्ति में हुनर छिपा होता है, जिसे तराशने और सही दिशा में मार्गदर्शन देने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “आज बच्चे भीड़ का हिस्सा बनकर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देते हैं, लेकिन हर किसी में अलग-अलग क्षमताएं होती हैं। पर्सनालिटी ग्रूमिंग के जरिए हम उनकी सोच को व्यापक बनाते हैं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाते हैं।”

भारती ने अपने सफर को याद करते हुए बताया कि कॉरपोरेट सेक्टर छोड़ने के बाद उन्होंने मॉडलिंग में कदम रखा और मिस एमपी का खिताब जीतने के बाद कई चैरिटी स्कूल और सेमिनार में लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि आत्मविश्वास की कमी ही लोगों की सबसे बड़ी बाधा बनती है। भारती का मानना है कि भाषा या डिग्री से अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का टैलेंट और आत्मविश्वास है। उनका कहना है, “अगर आपमें हुनर है, तो आप किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं। जोखिम उठाना और खुद को पहचानना ही सफलता की असली कुंजी है।”

आने वाले समय में भारती अधिक से अधिक लोगों को प्रेरित करने और व्यक्तित्व विकास की दिशा में काम करने की योजना बना रही हैं।

भोपाल की मशहूर फैशन डिज़ाइनर अल्पा रावल ने अपने डिज़ाइनर स्टूडियो “दिव्य फल” की कहानी साझा की। अल्पा ने बताया कि उन्होंने अपने दोनों बेटों के नाम को मिलाकर स्टूडियो का नाम रखा। उनकी शुरुआत फैशन डिज़ाइनिंग की पढ़ाई से हुई, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने इस क्षेत्र से दूरी बना ली। शादी के बाद भोपाल आने पर उनका फैशन के प्रति पुराना जुनून जागा और उन्होंने खुद के लिए ड्रेसेस डिज़ाइन करना शुरू किया। उनकी डिज़ाइनों को परिवार और दोस्तों से सराहना मिली, जिससे उन्हें प्रेरणा मिली और 2011 में उन्होंने अपने स्टूडियो की स्थापना की।

अपने सफर में चुनौतियों का सामना करते हुए, अल्पा ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती ग्राहकों की पसंद के अनुसार डिज़ाइन करना था। उनके अनुसार, फैशन में ट्रेंड के साथ-साथ हर व्यक्ति की बॉडी टाइप और कम्फर्ट को ध्यान में रखना ज़रूरी है। उन्होंने मिसेस अर्थ प्रियंका खुराना गोयल और मिसेस यूनिवर्स नेहा तिवारी जैसे नामचीन हस्तियों के लिए डिज़ाइन्स तैयार किए, जिनमें उनका चंद्रयान-थीम पर आधारित नेशनल कॉस्ट्यूम भी शामिल है।

अल्पा का मानना है कि फैशन केवल दिखावे का माध्यम नहीं बल्कि आत्मविश्वास बढ़ाने का साधन भी है। उनके स्टूडियो में कस्टमाइज़्ड ड्रेसेस और पुराने कपड़ों को नए अंदाज में पेश करने की सेवाएं भी उपलब्ध हैं। उनका सफर नए डिज़ाइनरों के लिए प्रेरणादायक है।

भोपाल की अल्का शर्मा, जो खदयोत नेचुरल्स की फाउंडर हैं, ने बताया कि उनका यह ब्रांड 17 जनवरी 2022 को शुरू हुआ। खदयोत नेचुरल्स का उद्देश्य बिना किसी केमिकल या प्रिजर्वेटिव के पूरी तरह प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद उपलब्ध कराना है। उनके प्रोडक्ट्स में बाजरे से बने थेपले, परांठे, और पिट्ठे, बच्चों के लिए विशेष सीज़निंग पाउडर, वेजिटेबल और फ्रूट पाउडर, और ट्रैवलर्स के लिए वन-पॉट मील्स शामिल हैं।

अल्का ने बताया कि खदयोत नेचुरल्स को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में शानदार प्रतिक्रिया मिली है। खासतौर पर उनकी सवा चावल की खीर और अन्य पारंपरिक व्यंजन दुबई, रूस, और हांगकांग जैसे बाजारों में बेहद लोकप्रिय हुए। कंपनी का लक्ष्य 2025 तक यूरोपीय, जापानी, और रूसी बाजारों में पारंपरिक भारतीय स्नैक्स को हेल्दी ट्विस्ट के साथ पेश करना है।

अल्का ने कहा कि प्राकृतिक खाद्य पदार्थ और ऑर्गेनिक फार्मिंग न केवल हमारी सेहत के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि कई बीमारियों जैसे थायरॉयड, कैंसर, और बच्चों में एपिलेप्सी जैसी समस्याओं को कम करने में भी मददगार हैं। उनका मानना है कि स्वास्थ्य और पोषण के लिए प्राकृतिक खाद्य पदार्थों को अपनाने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक विकास भी बेहतर हो सकता है। खदयोत नेचुरल्स इसी उद्देश्य के साथ पारंपरिक भारतीय खानपान को आधुनिक और स्वास्थ्यवर्धक स्वरूप में पेश कर रहा है।

गंज बासौदा, मध्य प्रदेश की मॉडल पब्लिक स्कूल की प्राचार्या हर्षिता नाहर जैन ने डीबी न्यूज नेटवर्क से बातचीत के दौरान बताया कि कैसे उन्होंने पढ़ाई और बच्चों को शिक्षित करने के अपने जुनून को अपने करियर का आधार बनाया। हर्षिता ने बताया कि 12वीं के बाद ही उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में रुचि होने लगी थी। शुरुआत में उन्होंने बिना किसी सैलरी के कंप्यूटर सेंटर में बच्चों को पढ़ाकर अनुभव प्राप्त किया। इसके बाद, विभिन्न प्राइमरी स्कूलों और गांवों के बच्चों को पढ़ाते हुए, उन्होंने अपनी शिक्षण कला को निखारा।

हर्षिता ने बताया कि शिक्षण के प्रति उनके समर्पण और बेहतर कम्युनिकेशन स्किल्स के कारण उन्हें सीनियर क्लासेज पढ़ाने का मौका मिला। अपनी मेहनत और लगन के बल पर उन्होंने प्राचार्या का पद हासिल किया। उन्होंने कहा कि एक शिक्षक को बच्चों की मनोविज्ञान समझने और उन्हें इंसान के रूप में बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

हर्षिता ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर बात करते हुए कहा कि बाजारवाद और आधुनिकता ने पढ़ाई को महंगा बना दिया है, लेकिन छोटे शहरों में फीस को नॉमिनल रखने और बच्चों के लिए फन लर्निंग एक्टिविटीज के जरिए शिक्षा को सरल और रुचिकर बनाने का प्रयास होना चाहिए। उनका मानना है कि एक शिक्षक का असली लक्ष्य बच्चों को सिर्फ पढ़ाई में नहीं बल्कि जीवन में आत्मनिर्भर और कॉन्फिडेंट बनाना होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।