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किशन रेड्डी बोले- सुषमा ने 2010 में ही लिखी थी चिट्ठी,कांग्रेस 60 साल में…

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना के साथ ही जाति गणना कराने का फैसला किया है। तमाम विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। वहीं जाति गणना का श्रेय लेने के लिए भी उनमें होड़ मच गई है। जिसके बाद भाजपा और विपक्ष की ओर से बयानबाजी भी शुरू हो गई है। इसी क्रम में केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने कहा कि जाति गणना करने के मोदी सरकार के ऐतिहासिक निर्णय के बाद विपक्ष में इसका श्रेय लेने की होड़ मच गई है। मगर, 60 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने जातिगत जनगणना क्यों नहीं कराई? वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इस पर पलटवार किया है।

रेड्डी ने कहा कि जाति गणना के प्रति भाजपा का रुख साफ है। 2010 में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा था कि देश में जातिगत जनगणना होनी चाहिए। हम इसका समर्थन करते हैं। तेलंगाना में हुई जाति गणना और उसके मॉडल पर पूछे सवाल पर रेड्डी ने कहा कि रेवंत रेड्डी सरकार ने पिछड़े वर्ग की गणना सही तरीके से नहीं की गई है। हम आधुनिक तकनीकी का उपयोग करते हुए, पूरी प्रामाणिकता, पारदर्शिता और वैज्ञानिक तरीके से जातिगत जनगणना करवाएंगे।

जी किशन रेड्डी ने कहा कि मोदी सरकार सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है। ओबीसी आयोग, ईडब्ल्यूएस और महिला आरक्षण हो तीन तलाक, सब निर्णय उसी प्रतिबद्धता का परिणाम हैं। जाति गणना भी अंत्योदय की दिशा में ऐतिहासिक निर्णय साबित होगा।

दो साल पहले सरकार को लिखी चिट्ठी, तब वे जाति गणना के लिए नहीं हुए सहमत : खरगे
वहीं, जाति गणना कराने की मोदी सरकार की घोषणा के साथ अब राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि मैंने दो साल पहले जनगणना के साथ जाति गणना कराने के लिए सरकार को पत्र लिखा था, तब वे सहमत नहीं थे, लेकिन अब सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया है। सरकार का यह अच्छा कदम है, जिसमें हम सरकार का पूरा समर्थन करेंगे।

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष खरगे ने कहा, कांग्रेस और दूसरी विपक्षी दलों ने जाति गणना के लिए पूरे देश में आंदोलन भी किया था। अब विपक्षी पार्टियां खुश हैं कि उन्होंने जो चाहा था वह हासिल कर लिया। उन्होंने सरकार से अगली जनगणना में जाति गणना कराने के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करने और इसकी समय सीमा निर्धारित करने का आग्रह किया है। उन्होंने भाजपा से कहा कि वह पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू पर अनावश्यक टिप्पणी न करे कि वह इसके विरोध में थे। जनसंघ व संघ जन्म से ही आरक्षण के खिलाफ हैं। भाजपा जनता के मन में भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रही है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।