नई दिल्ली। देश में संविधान बनाम मनुस्मृति की बहस के बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर का बयान सियासत में नई हलचल पैदा कर गया है। थरूर ने कहा है कि आरएसएस और बीजेपी अब बदल चुके हैं और संभवत: वे अपनी पुरानी सोच से आगे बढ़ चुके हैं। थरूर का यह बयान उस वक्त आया है जब कांग्रेस और विपक्षी दल लगातार आरएसएस-बीजेपी पर संविधान से छेड़छाड़ के आरोप लगा रहे हैं।
दरअसल, हाल ही में आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने संविधान की प्रस्तावना से ‘सेक्युलर’ और ‘सोशलिस्ट’ जैसे शब्दों को हटाने का समर्थन किया था। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक घमासान शुरू हो गया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तीखा हमला करते हुए कहा कि आरएसएस-बीजेपी संविधान नहीं, बल्कि मनुस्मृति चाहते हैं। वे बहुजनों और गरीबों से उनके अधिकार छीनना चाहते हैं। राहुल ने कहा कि हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे और हर देशभक्त भारतीय संविधान की रक्षा करेगा।
राहुल गांधी के इस बयान पर जब मीडिया ने शशि थरूर से सवाल पूछा तो उन्होंने थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि राहुल गांधी ऐतिहासिक तथ्य का जिक्र कर रहे थे। संविधान निर्माण के समय श्री गोलवलकर समेत कई लोगों ने कहा था कि संविधान में मनुस्मृति की कोई झलक नहीं है, जो एक कमी है। लेकिन मेरा मानना है कि आरएसएस अब उन दिनों से आगे बढ़ चुका है। आज उनकी सोच क्या है, यह वही बेहतर बता सकते हैं।
थरूर के इस बयान के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर ही मतभेद उभर आए हैं। कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने थरूर के बयान पर अप्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि आरएसएस महासचिव खुद कह रहे हैं कि सेक्युलरिज्म और सोशलिज्म को खत्म करना चाहिए और थरूर साहब कुछ और ही कह रहे हैं। थरूर हमारे वरिष्ठ नेता हैं, उनका सम्मान करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि ‘पीने वाले को पीने का बहाना चाहिए, बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी’।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि थरूर ने अपने बयान में एक ओर जहां ऐतिहासिक सच को स्वीकार किया, वहीं आरएसएस-बीजेपी पर सीधा हमला करने से भी बचे। वहीं, कांग्रेस के भीतर इस बात पर नाराजगी है कि पार्टी जब आरएसएस-बीजेपी को संविधान विरोधी बताकर मोर्चा खोले हुए है, ऐसे समय में थरूर का यह ‘नरम रुख’ संदेश को कमजोर कर सकता है। अब देखना होगा कि कांग्रेस इस अंतरविरोध को कैसे संभालती है और बीजेपी इसे कितना भुनाने की कोशिश करती है।





