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राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग के अधिकारों को मुसलमानों में बांटा

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नई दिल्ली। कर्नाटक के सभी मुस्लिमों को ओबीसी में शामिल करने पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने कहा है कि सभी मुस्लिमों को ओबीसी के दायरे में लाकर सरकारी नौकरियों व शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण देने के कर्नाटक सरकार के फैसले से वास्तविक पिछड़ी जातियों के साथ अन्याय हुआ है।

आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर ने कहा कि राज्य सरकार ने मुसलमानों की सभी 37 जातियों को अल्पसंख्यक अन्य पिछड़ा वर्ग की नई श्रेणी बनाकर ओबीसी में शामिल कर पिछड़ा वर्ग के अधिकारों को मुसलमानों में बांट दिया है। आयोग का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन आरोपों के संदर्भ में अहम है, जिसमें पीएम ने कहा था कि कांग्रेस दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के आरक्षण में मुस्लिमों को हिस्सा देना चाहती है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने इस बारे में कर्नाटक सरकार के पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग से जवाब-तलब किया था। विभाग ने जवाब में कहा कि मुस्लिम और ईसाई जैसे समुदाय न तो जाति हैं, और न ही धर्म। कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में पिछड़ा वर्ग श्रेणी 1 को मिलने वाले 4 फीसदी आरक्षण में कुल 391 जातियां हैं, जिनमें 17 मुस्लिम समुदाय की हैं। इसी तरह, श्रेणी 2ए के तहत 393 जातियों में से 19 मुसलमान जातियां शामिल हैं। श्रेणी 2बी में 4 फीसदी कोटा पाने वाली सिर्फ एक जाति है और वह मुसलमान है।

मुस्लिमों को 4% की जगह करीब 16% आरक्षण मिला
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज अहीर ने कहा कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने सभी मुस्लिम जातियों को गलत तरीके से सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के रूप में मान्यता दी है। उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए पिछड़े वर्गों की राज्य सूची में श्रेणी 2-बी के तहत अलग से मुस्लिम जाति के रूप में सूचीबद्ध किया है। इसके चलते पंरास्नातक में राज्य के खाते में श्रेणी 2बी के तहत आने वाली 930 सीटों में से 102 मुसलमानों को मिली हैं। मुस्लिमों को 4% की जगह करीब 16% आरक्षण मिला। इसके अलावा, कर्नाटक सरकार श्रेणी-1 के तहत 17 और श्रेणी 2-ए के तहत 19 मुस्लिम जातियों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण दे रही है। अहीर ने बताया, स्थानीय निकायों के चुनाव में पिछड़े वर्गों को दिए जाने वाले आरक्षण का 32% है। शिक्षा व रोजगार में आरक्षण के विपरीत, स्थानीय निकायों में आरक्षण पिछड़े वर्ग समूहों यानी श्रेणी 1, श्रेणी 2ए, श्रेणी 2 बी, श्रेणी 3ए व श्रेणी 3बी के बीच विभाजित नहीं है।

2011 की जनगणना के अनुसार, कर्नाटक में मुस्लिम आबादी 12.92% है और मुस्लिम समुदाय (धार्मिक अल्पसंख्यक) सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग माना है। मुस्लिम धर्म में जाति व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, व्यवहार में यह निर्विवाद रूप से नहीं कहा जा सकता कि इस्लाम पूरी पूरी तरह से जातिवाद से प्रतिरक्षित और असंवेदनशील है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।