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स्कूल फीस, किताबें और यूनिफॉर्म महंगी होने से बिगड़ा अभिभावकों का बजट…निजी विद्यालय कर रहे मनमानी, जिम्मेदार बने मूकदर्शक

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नई दिल्ली। नया शैक्षणिक सत्र देश भर के स्कूलों में आज से (1 जुलाई) से शुरू हो गया है। जिसको लेकर स्टूडेंट और पेरेंट्स से दोनों ही उत्साहित हैं। पर इसके साथ ही स्कूलों की फीस भी अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रही है। कई स्कूलों ने शैक्षणिक सत्र 2023-2024 के लिए फीस बढ़ाई है। नए सत्र की दाखिला प्रक्रिया भी चल रही है। अभिभावकों से जो जानकारी मिली है, उसके मुताबिक स्कूलों ने औसतन 10 से 15 फीसदी तक फीस बढ़ाई है। महंगी किताबें और विद्यालयों की बढ़ी फीस अभिभावकों की कमर तोड़ने का काम कर रही हैं। पर कहीं ना कहीं ऐसा लगता है की जिम्मेदार आंखें मूंद कर बैठ गए हैं। जरूरी है वह इस वृद्धि पर नियंत्रण लगाने की और कम करें।

 

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इस विषय पर हमनें कुछ अभिभावकों से बात की और उनकी प्रतिक्रिया जानी।

शालिनी गोयल, अभिभावक, आगरा, यूपी

प्राइवेट स्कूल को प्राइवेट पब्लिशर्स की बुक पर ज्यादा फोकस नहीं करना चाहिए बल्कि एनसीईआरटी की बुक्स की तरफ ध्यान देना चाहिए और पेरेंट्स स्वतंत्र होने चाहिए कि वह स्कूल द्वारा चयनित की हुई दुकानों से नहीं बल्कि किसी भी दुकान से अपने बच्चों के लिए बुक खरीद सकें और वह बुक्स मार्केट में हर दुकान पर उपलब्ध होना चाहिए।
हर साल प्राइवेट स्कूल जो फीस बढ़ाते हैं उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है की वह ठीक है या नहीं। क्योंकि इसका सीधा बोझ पेरेंट्स पर आता है। आजकल एलकेजी, यूकेजी क्लास के बच्चों के स्कूल बैग्स इतने वजनदार हो गए हैं कि उनको कई बार शारीरिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है जरूरी है की जिम्मेदार इस और सोचें और इस पर एक्शन लें।

पल्लवी भावेश मिश्रा, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

एक अभिभावक होने के नाते मुझे सबसे बड़ी चिंता रहती है बच्चों के स्कूल बैग्स के वजन की, क्योंकि कई बार ज्यादा वजन के बैग्स बच्चों की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। और इसके साथ निजी स्कूलों की फीस का एक मापदंड तय होना चाहिए की सभी निजी स्कूलों में एक तरह की फीस हो। जिससे अभिभावक पर उसका ज्यादा बोझ ना पड़े।
प्राइवेट स्कूल को शिक्षा के मंदिर की संवेदनाओं के आधार पर काम करना चाहिए ना की उसे सिर्फ व्यापार समझकर। आज के समय में तरह-तरह की एक्टिविटीज के नाम पर जो स्टूडेंट्स को इंवॉल्व किया जाता है इसका सीधा असर अभिभावक पर पड़ता है। हर अभिभावक की जब एक जैसी नहीं होती है, स्कूलों को इस और ध्यान देना चाहिए।

डॉ शिल्पा किंगर, अभिभावक एवं शिक्षाविद, ग्वालियर, एमपी

आज के समय में निजी विद्यालय न सिर्फ स्कूल फीस बढ़ा रहे हैं बल्कि स्कूल फीस के साथ-साथ ट्रांसपोर्टेशन फीस, बुक्स, स्कूल यूनिफॉर्म आदि सभी चीजों में कॉस्ट इंक्रीज कर रहे हैं। जिसका सीधा बोझ सिर्फ अभिभावक पर पड़ रहा है। स्कूल डायरेक्टर्स को यहां समझना होगा कि पेरेंट्स पर ज्यादा दबाव न डालें।
अगर आप बुक्स देखेंगे तो ज्यादातर स्कूल की बुक प्राइवेट पब्लिशर्स की हैं और यह बुक आपको मार्केट में एक बार में किसी भी दुकान पर नहीं मिलेंगी। इसके लिए आपको बूक सेलर के पास तीन से चार बार जाना पड़ेगा। आजकल के समय में जब हर चीज ऑनलाइन मंगाई जा सकती है तो फिर बच्चों के लिए स्कूल बुक्स ऑनलाइन उपलब्ध क्यों नहीं हैं। मुझे लगता है कि लोकल एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी और स्कूल बोर्ड अथॉरिटी को इसमें इंटरफेयर जरूर करना चाहिए जिससे कोई भी स्कूल पेरेंट्स पर अत्याधिक दवाब न डाले।

रेनू राणा, अभिभावक, आगरा, यूपी

आजकल के समय में हम देख रहे हैं कि सभी प्राइवेट स्कूलों में कॉर्पोरेट कल्चर होता जा रहा है। स्कूलों द्वारा प्रतियोगिताओं के नाम पर भी महंगी एसेसरीज मंगवाई जाती हैं, जिससे भी पेरेंट्स पर बोझ बढ़ता है। हर साल एकेडमिक सेशन के शुरुआत में उनकी चयनित दुकान होती हैं जिनसे मजबूरी में अभिभावकों को किताबें खरदनी होती हैं। इस पर पूरी तरह रोक लगाना चाहिए।
जिम्मेदारों को इस और भी ध्यान देना चाहिए कि किस स्कूल में किस पब्लिशर्स की किताब स्कूल द्वारा बच्चों को दिलवाई जा रही है। और मनमानी फीस से अभिभावकों को आराम मिलना चाहिए। इसके लिए जिम्मेदारों को सभी निजी विद्यालयों में विजिट भी करना चाहिए।

डॉ इंद्रेश आनंद सिंघल, अभिभावक, नोएडा, यूपी

हर साल स्कूल फीस बढ़ा देना, किताबों के दाम बढ़ा देना, पब्लिशर्स बदल देना। इसका सीधा खामियाजा पेरेंट्स की जेब पर पड़ता है। कई स्कूल तो स्कूल के अंदर से ही बुक सेट पेरेंट्स को सेल करते हैं।
सभी स्कूलों को अनिवार्य रूप से एनसीईआरटी की किताबों द्वारा पढ़ाई करवाना चाहिए। जिससे पेरेंट्स को थोड़ी राहत मिल सके।
स्कूलों के इस रवैए से पेरेंट्स के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता, उन्हें मजबूरन स्कूल द्वारा चयनित दुकान से ही बुक्स परचेज करनी पड़ती हैं। शिक्षा विभाग को इस और ध्यान देना चाहिए, बल्कि जो स्कूल नियम विरुद्ध अनावश्यक तौर पर अभिभावकों को परेशान करते हैं उन पर कड़ी कार्रवाई होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।