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आगरा की साइकोलॉजिस्ट छवी शर्मा का विशेष वक्तव्य: “मन को समझना जरूरी है, ब्रेन और मन हैं अलग”

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नई दिल्ली। मनोविज्ञान को लेकर समाज में बढ़ती जागरूकता के बीच, आगरा की जानी-मानी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट काउंसलर, छवी शर्मा ने अपने अनुभव और ज्ञान को साझा किया। पिछले 15 वर्षों से आगरा में काम कर रहीं छवी शर्मा ने 7 सालों से इंडियन आर्मी के साथ काउंसलिंग सेवाएं प्रदान की हैं। इसके अलावा, वह स्कूलों और एनजीओ के साथ भी काम कर रही हैं।

छवि ने बताया, “साइकोलॉजी को हम मन का विज्ञान कहते हैं, जैसे शरीर का एक विज्ञान होता है, वैसे ही मन का भी होता है। हालांकि, ज्यादातर लोग इसे नहीं समझ पाते। वे मन और दिमाग को एक ही समझते हैं, जबकि ब्रेन एक हार्डवेयर है और मन सॉफ्टवेयर की तरह है। मन हमारे विचारों और भावनाओं का केंद्र होता है, जबकि दिमाग यादों को संग्रहित करता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि अधिकतर लोग यह नहीं समझ पाते कि मन और ब्रेन अलग-अलग हैं। “हमारे दिमाग में यादें स्टोर होती हैं, लेकिन हमारी भावनाएं और विचार मन में रहते हैं। यही कारण है कि जब किसी की याददाश्त चली जाती है, तब भी वह भावनाओं को महसूस करता है।”

छवी शर्मा ने आजकल की समस्याओं जैसे डिप्रेशन, एंग्जायटी, और फोबिया पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “भारत में हर चार में से एक व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है, लेकिन लोगों को इसका एहसास ही नहीं होता। ओवरथिंकिंग डिप्रेशन की पहली स्टेज होती है।” उन्होंने यह भी कहा कि परिवार और दोस्तों को ऐसे व्यक्तियों के प्रति सजग रहना चाहिए और बिना किसी दबाव के उनसे बात करनी चाहिए।

छवी ने बताया कि साइकोलॉजिस्ट बनने की प्रेरणा उन्हें स्कूल के दिनों से मिली। “11वीं क्लास में मुझे साइकोलॉजी सब्जेक्ट मिला था और वहीं से मुझे इसमें दिलचस्पी आने लगी। 12वीं तक मैंने साइकोलॉजिस्ट बनने का फैसला कर लिया था।”

उन्होंने समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जरूरतों पर जोर दिया और लोगों से अपील की कि वे अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करें और आवश्यकता पड़ने पर निसंकोच साइकोलॉजिस्ट काउंसलर का परामर्श लें।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।