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दिल्ली में राहुल-प्रियंका के प्रचार के बावजूद कांग्रेस का खाता नहीं खुला

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नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतगणना जारी है। इस बीच अब तक आए रुझानों में भाजपा को जबरदस्त बढ़त मिलती दिख रही है। वहीं, लगातार तीन बार चुनाव जीत चुकी आम आदमी पार्टी कड़े संघर्ष में पिछड़ गई है। इस बीच कांग्रेस का हाल बीते दो चुनावों की कहानी दोहरा रहा है। फिलहाल पार्टी का राजधानी में खाता भी खुलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में दिल्ली में कांग्रेस के चुनाव प्रचार की तैयारियों को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। कई लोगों ने स्टार चेहरों के प्रभाव के बेअसर होने की बात कही है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने कुल कितनी रैलियां की हैं? उनकी रैलियों का दिल्ली में क्या प्रभाव पड़ा? इसके अलावा कौन सी सीटें उनकी रैलियों में सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती थीं? आइये जानते हैं.

राहुल-प्रियंका ने दिल्ली में कुल कितनी रैलियां कीं?
दिल्ली में राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत 13 जनवरी को ही कर दी थी। उन्होंने सबसे पहले पूर्वोत्तर दिल्ली (5 सीट) के सीलमपुर से चुनाव प्रचार की शुरुआत की। वहीं, प्रियंका गांधी वाड्रा ने 31 जनवरी को विधानसभा चुनाव के लिए पहली रैली की। दोनों नेताओं ने दिल्ली के छह जिलों में कुल 11 रैलियां कीं। इनमें सबसे ज्यादा तीन रैलियां उत्तर दिल्ली में कीं। वहीं, पश्चिम दिल्ली में दो, मध्य दिल्ली में दो, पूर्वोत्तर दिल्ली में दो, शहादरा और पश्चिम दिल्ली में एक-एक रैली शामिल रही।

राहुल गांधी ने रैलियों से कितने जिले कवर किए
राहुल गांधी ने दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए सात रैलियां कीं। इससे उन्होंने पांच जिले अकेले कवर किए। जहां राहुल ने पटपड़गंज में 28 जनवरी की अपनी रैली से उत्तर दिल्ली की आठ सीटों को कवर किया, वहीं इसी दिन ओखला में रैली से उन्होंने दक्षिण पूर्व दिल्ली की सात सीटों को साधने की कोशिश की। इसके अलावा उन्होंने 31 जनवरी को पश्चिमी दिल्ली की सात सीटों को साधने की कोशिश की। राहुल की आखिरी रैली 1 फरवरी को हुई, जिसमें उन्होंने सदर बाजार में रैली कर सात सीटों को कवर किया। इस तरह राहुल ने कुल 34 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की हवा बनाने की कोशिश की।

प्रियंका गांधी की रैलियों का कितना प्रभाव?
दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री काफी देर से हुई। उन्होंने जनवरी के आखिरी दिन पश्चिम दिल्ली की नांगलोई जाट सीट से प्रचार की शुरुआत की। राहुल गांधी ने भी इसी दिन पश्चिम दिल्ली सीट पर प्रचार किया था। यानी राहुल-प्रियंका ने पश्चिम दिल्ली विधानसभा सीट पर खुद से ही काफी ध्यान दिया और सभी सात सीटों को जीतने के लिए ताकत झोंक दी।

उधर, 1 फरवरी को प्रियंका ने मध्य दिल्ली (सात सीटें) और पूर्वोत्तर दिल्ली (पांच सीटें) के समीकरण साधने के लिए रैलियां कीं। प्रियंका की दिल्ली विधानसभा चुनाव में आखिरी रैली शहादरा में हुई, जिसे राहुल गांधी ने कवर नहीं किया था। प्रियंका ने सीमापुरी में रैली कर पांच और सीटों पर कांग्रेस को जिताने का प्रयास किया।

इस लिहाज से प्रियंका गांधी वाड्रा ने कुल 24 सीटों को साधने के लिए रैलियां कीं। हालांकि, राहुल ने अपने प्रचार से इनमें से 19 सीटों को कवर करने की कोशिश की। प्रियंका ने राहुल से अलग सिर्फ एक नए जिले- शहादरा में कांग्रेस की जमीन अलग से तैयार करने का काम किया।

राहुल-प्रियंका की तरफ से रैलियों के जरिए 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की कोशिशें रुझानों में सफल होती नहीं दिख रहीं। दोनों ने जहां-जहां रैलियां की, वहां भी उन्हें एक भी सीट मिलती नहीं दिख रही।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।