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सपनों से सफलता तक: युवाओं की प्रेरक कहानियों ने रचा मुकाम

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नई दिल्ली। भोपाल, दिल्ली, बड़ौदा से लेकर देश-विदेश तक—इन युवाओं ने अपनी मेहनत, जुनून और रचनात्मकता से अपनी पहचान बनाई है। कोई माइक थामे मंच पर छा गया, तो कोई ड्रम की ताल पर देश-दुनिया में गूंजा। फैशन की दुनिया में किसी ने पारंपरिक डिज़ाइनों को नए रंग दिए, तो किसी ने बुटीक के ज़रिए महिला सशक्तिकरण की मिसाल पेश की। अमन मिश्रा, सिद्धार्थ जैन, दिव्यराज भटनागर, गौरव सिंह और नवीन कोहली जैसे युवाओं की कहानियाँ आज न सिर्फ प्रेरणा देती हैं, बल्कि यह भी साबित करती हैं कि जुनून हो तो मंज़िलें खुद रास्ता बना लेती हैं।

स्टेज से स्टेडियम तक”: प्रोफेशनल एंकर सिद्धार्थ जैन का सपना वर्ल्ड कप तक पहुंचने का

भोपाल, मध्य प्रदेश के युवा और जोशीले प्रोफेशनल एंकर एवं दो बार के TEDx स्पीकर सिद्धार्थ जैन ने अपने जुनून और संघर्ष की कहानी साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने बिना किसी बड़ी पहचान के एंकरिंग की दुनिया में कदम रखा। उस दौर में जब इंस्टाग्राम से ज़्यादा फेसबुक प्रचलन में था, वे लगातार फेसबुक पर खुद को प्रमोट करते रहे। सिद्धार्थ ने रिश्तेदारों, दोस्तों और जान-पहचान के सभी लोगों को खुद कॉल कर बताया कि वे एंकरिंग कर रहे हैं और किसी को ज़रूरत हो तो संपर्क करें। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में उन्हें बिना पैसे के भी काम करना पड़ा, लेकिन पिताजी के कहे अनुसार उन्होंने अनुभव को प्राथमिकता दी – और वही अनुभव आज उन्हें देश भर के बड़े मंचों तक ले गया।


सिद्धार्थ के लिए 2023 में 37वें नेशनल गेम्स ऑफ इंडिया को होस्ट करना एक मील का पत्थर रहा। गोवा में हुए इस इवेंट में उन्होंने सिर्फ अनाउंसमेंट नहीं की, बल्कि अलग-अलग राज्यों से आए खिलाड़ियों से घुल-मिलकर एक दोस्ताना माहौल बनाया। साथ ही उन्होंने ग्रीन हब जैसे ट्राइबल चिल्ड्रन फेस्टिवल को होस्ट करने का जिक्र किया, जहां देश के दूर-दराज के आदिवासी इलाकों से आए बच्चों के साथ जुड़ने के लिए उन्होंने उनकी लोकल लैंग्वेज और संस्कृति सीखी। यह अनुभव सिद्धार्थ के लिए न सिर्फ एक सामाजिक जुड़ाव था, बल्कि एक कलाकार के रूप में खुद को हर वर्ग से जोड़ने की काबिलियत भी दिखाता है।


7 वर्षों के इस रंगमंचीय सफर में सिद्धार्थ ने 500 से अधिक परिवारों के वेडिंग इवेंट्स को होस्ट कर एक खास पहचान बनाई है। उनका मानना है कि जब एक एंकर को परिवार का हिस्सा समझा जाने लगे, तब असली जुड़ाव होता है। आज उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है कि वे भविष्य में किसी क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए एंकरिंग करें, खिलाड़ियों के साथ बातचीत करें और देश के 140 करोड़ लोगों के सामने अपने शब्दों और जोश से रंग बिखेरें। उनका मानना है – “जो सपना क्रिकेट खेलने का नहीं पूरा हुआ, शायद माइक के ज़रिए वो सपना ज़रूर जी पाऊं।”

माइक का लाल” बना मंच का सितारा: भोपाल के अमन मिश्रा की प्रेरणादायक यात्रा

भोपाल, मध्य प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेशनल एंकर अमन मिश्रा की कहानी, आत्मविश्वास की कमी से लेकर माइक के जादूगर बनने तक की एक प्रेरणादायक यात्रा है। अमन ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में एक साधारण कोचिंग क्लास से की थी, जहाँ उन्होंने पहली बार अपनी शायरी सबके सामने रखी। धीरे-धीरे कोचिंग के डायरेक्टर की नज़र उन पर पड़ी और नवरात्रि के एक कार्यक्रम की एंकरिंग के साथ उनका मंचीय सफर शुरू हुआ। इसके बाद CA स्टूडेंट्स के बीच उन्होंने कार्यक्रमों की मेज़बानी की और वहीं से अपने एंकरिंग स्किल्स को निखारना शुरू किया।

2016 में भोपाल में ओपन माइक कल्चर के आगमन के साथ अमन ने स्टैंड अप कॉमेडी की दुनिया में भी कदम रखा। उनकी कला को लोगों ने इतना पसंद किया कि जल्द ही उन्हें वेडिंग्स, कॉर्पोरेट इवेंट्स और बड़े शो में बुलावा आने लगा। “माइक का लाल” नाम भी एक मंच पर ही जन्मा — एक शायर की पंक्ति से प्रेरित होकर। आज अमन मिश्रा 1000 से भी अधिक शोज़ होस्ट कर चुके हैं और भारत के लगभग हर बड़े शहर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं। मुंबई के हैबिटैट स्टूडियो से लेकर कैनवस क्लब, और जिम कॉर्बेट से ओरछा के राजमहलों तक – हर मंच उनके अनुभव का हिस्सा बन चुका है।

अमन मिश्रा मानते हैं कि एक सफल एंकर बनने के लिए सबसे जरूरी है “ऑडिएंस को समझना और आत्मविश्वास बनाए रखना।” वे अब न केवल खुद को देश के अग्रणी एंकरों में गिनते हैं बल्कि भविष्य में “माइका इंस्टीट्यूट” के नाम से एक ट्रेनिंग स्कूल खोलने की योजना भी बना रहे हैं, ताकि युवा भारत को आत्मविश्वासी और कम्युनिकेशन में सशक्त बनाया जा सके। उनका सपना है कि जब भी किसी के ज़हन में “एंकरिंग” का नाम आए, तो अमन मिश्रा की छवि सामने हो।

ढोल नहीं, ये ड्रम है”: दिल्ली के ड्रमर दिव्यराज भटनागर की देश से दुनिया तक की तालबद्ध यात्रा

नई दिल्ली से प्रोफेशनल ड्रमर दिव्यराज भटनागर ने अपने 15 साल के संगीत सफर की कहानी साझा करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने बचपन से ही किताबों से ज़्यादा ड्रम से रिश्ता जोड़ा। आठवीं कक्षा में पढ़ाई से मन हटकर उन्होंने खुद को छत पर बंद कर घंटों ड्रमिंग में झोंक दिया। भोपाल में शुरुआती दौर में जजिंग से लेकर लोकल शोज़ तक की यात्रा करते हुए दिव्यराज ने एक बड़ा फैसला लिया—अपना गृहनगर छोड़कर दिल्ली आकर ड्रमिंग को पूर्णकालिक पेशा बनाना। उनके शब्दों में, “पढ़ाई में मन नहीं था, पर मुझे यकीन था कि ड्रमिंग से कुछ बड़ा कर सकता हूँ।”

दिल्ली में रहते हुए दिव्यराज ने भारत के लगभग हर कोने में शोज़ किए हैं और थाईलैंड से लेकर यूरोप तक इंटरनेशनल टूर भी किए हैं। उन्हें यूट्यूब फैन फेस्ट (मुंबई और दिल्ली), बैंकाक टूर, और जिंदल स्टील्स के प्राइवेट इवेंट्स जैसे हाई-प्रोफाइल शोज़ में परफॉर्म करने का मौका मिला। उनका कहना है कि दिल्ली जैसी जगहों पर एक कलाकार को असली पहचान और इज्ज़त मिलती है—वहीं, छोटे शहरों में कलाकारों को आज भी “बैंड वाला” कहकर पहचाना जाता है, जबकि बड़े शहरों में लोग समझते हैं कि ड्रमिंग एक प्रोफेशनल और अंतरराष्ट्रीय कला है।

अब दिव्यराज का सपना है कि वे आने वाले वर्षों में भारत का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय ड्रमिंग कॉम्पिटिशन्स में करें। उनका विज़न साफ है—“मैं सिर्फ ड्रम बजाना चाहता हूँ, और ऐसा बजाना चाहता हूँ कि दुनिया जाने कि India has a drummer named Divyaraj।” वे उम्मीद करते हैं कि ड्रमिंग को लेकर जो सामाजिक धारणाएं हैं, उन्हें तोड़कर भारत के युवा कलाकारों को एक नई राह दिखा सकें।

भोपाल के ‘द पल्लवी बुटीक’: नवीन कोहली का संघर्ष से सफलता तक का फैशनेबल सफर

भोपाल, मध्य प्रदेश से द पल्लवी बुटीक के फाउंडर नवीन कोहली ने अपने करियर के संघर्षों को साझा करते हुए बताया कि फैशन इंडस्ट्री में खुद को हर सप्ताह अपडेट करना पड़ता है, और यह आसान काम नहीं है। आउटफिट्स की कस्टमाइज़ेशन, इंडियन फैब्रिक एक्सप्लोरेशन और प्रशिक्षित स्टाफ की चुनौती के बीच उन्होंने अपना व्यवसाय खड़ा किया है। उन्होंने यह भी कहा कि जो स्टाफ शुरुआत में उनके साथ जुड़ा था, वह आज भी उनके साथ है—और यही उनके स्टार्टअप की सबसे बड़ी ताकत है।

नवीन कोहली ने बताया कि उन्होंने न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि पंजाब, ओडिशा, गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के लिए भी डिज़ाइनिंग की है। वह बताते हैं कि हर राज्य की अपनी सांस्कृतिक विरासत है, जैसे ओडिशा की इकट, गुजरात का अजरक, और मध्य प्रदेश का फाग। वे कहते हैं, “हर फैब्रिक एक कहानी कहता है, और हम उसे आउटफिट्स में ढालते हैं जो परंपरा और आधुनिकता दोनों को दर्शाते हैं।” उनके बुटीक में ऐसी डिज़ाइनिंग होती है, जो क्षेत्रीय कलाओं को ग्लोबल स्टाइल में बदल देती है।

भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए नवीन ने बताया कि उनका सपना सिर्फ खुद को नहीं, बल्कि और लोगों को साथ लेकर चलने का है। वह चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग उनके साथ काम करें, और उनके साथ मिलकर सफलता की नई ऊंचाइयाँ हासिल करें। उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले समय में द पल्लवी बुटीक का एक और नया स्टोर खोलने की योजना है। उनका मानना है, “अगर आप अपने एम्प्लॉयीज़ का भला सोचते हैं, तो आपका भला अपने आप होता है।”

गुरु ब्रांड के गौरव सिंह: बड़ौदा से उठकर फैशन इंडस्ट्री में रच रहे हैं डिज़ाइन का नया अध्याय

गुजरात के बड़ौदा से फैशन लेबल गुरु ब्रांड के फाउंडर गौरव सिंह ने बताया कि उन्होंने कभी फैशन इंडस्ट्री में आने की योजना नहीं बनाई थी—सब कुछ जैसे समय और किस्मत के साथ होता चला गया। एक छोटे से काम की शुरुआत करते हुए उन्होंने खुद को मैन्युफैक्चरिंग और होलसेल डिज़ाइनिंग की दुनिया में पाया, जहाँ अब उनका ब्रांड नवरात्रि, वेडिंग, हल्दी, मेहंदी और संगीत जैसे इवेंट्स के लिए खासतौर पर इंडो-वेस्टर्न और ब्राइडल कलेक्शन तैयार करता है। गौरव कहते हैं, “ऊपर वाला खुद ही रास्ता बना देता है, बस चलते जाना पड़ता है।”

गौरव का डिज़ाइन वर्क आज गुजरात से लेकर अन्य राज्यों तक फैला है, और उन्होंने बताया कि वे हर महीने करीब 350 पीसेज़ और सालभर में 55 से ज्यादा डिज़ाइन्स तैयार करते हैं। उन्होंने हाल ही में एक नया टाई-अप किया है जिसमें एक ही डिज़ाइन के 1000 पीस मैन्युफैक्चर किए जाएंगे। गुजरात, खासकर सूरत जैसे टेक्सटाइल हब के करीब होने का फायदा भी उन्हें मिलता है, क्योंकि यहाँ फैशन बहुत तेजी से बदलता है। उनका मानना है कि अगर प्राइसिंग सही हो, तो क्वालिटी और कस्टमर दोनों टिकते हैं।

हालाँकि गौरव इस इंडस्ट्री की गहराई और चुनौतियों को लेकर भी बहुत सजग हैं। वे कहते हैं, “यह लाइन रोज़ कुछ नया सिखाती है, हर डिज़ाइन, हर क्लाइंट और हर इवेंट एक नई परीक्षा होती है।” शुरुआती समय में कोई गाइडेंस नहीं होने के बावजूद, उन्होंने जो अनुभव खुद गढ़े हैं, वही आज उन्हें प्रतिस्पर्धा के इस दौर में टिके रहने की ताकत देते हैं। गुरु ब्रांड आज न सिर्फ गुजरात बल्कि पूरे भारत में एक पहचान बना चुका है, और गौरव का सपना है कि आने वाले वर्षों में वह अपने डिज़ाइनों को ग्लोबल लेवल पर भी ले जाएँ।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।