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मध्यप्रदेश की महिलाओं की प्रेरणादायक यात्रा… संघर्ष, सफलता और समाज सेवा में महिलाओं का अहम योगदान, बनाई अपनी पहचान

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नई दिल्ली। भोपाल की दिव्या इंद्रा चैटर्जी ने अपने संघर्ष और मेहनत से यह साबित कर दिया कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकती हैं। एक छोटे से शहर से आई दिव्या ने न केवल शिक्षा और करियर में ऊंचाइयां हासिल कीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में भी काम किया। वहीं, इंदौर की शीतल अग्रवाल ने समाज सेवा और पेशेवर जीवन को एक साथ साकार कर यह दिखाया कि एक महिला परिवार और समाज दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भोपाल की एंकर हर्षिता लालवानी ने मीडिया की दुनिया में अपने हुनर का लोहा मनवाया और महिलाओं को यह संदेश दिया कि वे किसी भी पेशे में सफलता हासिल कर सकती हैं। इंदौर की कल्पना रमन ने कारोबार में सफलता प्राप्त कर यह सिद्ध किया कि एक महिला की इच्छाशक्ति किसी भी बाधा को पार कर सकती है। अंत में, भोपाल की रजिंदर कौर की कहानी यह साबित करती है कि कड़ी मेहनत और समर्पण से न केवल व्यक्तिगत सफलता प्राप्त की जा सकती है, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। इन सभी महिलाओं की यात्रा अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।

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भोपाल की चार्टर्ड अकाउंटेंट और हेल्थकेयर फाउंडेशन की फाउंडर दिव्या इंद्रा चैटर्जी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं के बारे में बात की। उन्होंने बताया कि किस तरह से उन्होंने समाज के लिए कुछ खास करने की इच्छा से सीए को अपना करियर चुना। दिव्या का मानना है कि शिक्षा में सच्ची निष्ठा और ईमानदारी से काम करने की भावना उन्हें अपनी सफलता की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करती है। साथ ही, उनका यह भी कहना था कि उनका समाज को कुछ वापस देने का विश्वास उन्हें सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करता है।

दिव्या ने बताया कि कोविड की पहली लहर के दौरान उन्होंने अपने सपनों को साकार करते हुए एक एनजीओ की शुरुआत की। उनका यह एनजीओ, “सीपीएचडी हेल्थकेयर फाउंडेशन”, अब कई वॉलंटियर्स और होनहार लोगों के साथ समाज में सेवा कर रहा है। दिव्या का मानना है कि हम समाज से बहुत कुछ लेते हैं, इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम कुछ वापस भी दें। उन्होंने सोशल वर्क के लिए अपनी टीम बनाई और इस कार्य में सफलतापूर्वक योगदान दिया।

दिव्या ने कहा कि किसी भी काम में सच्ची प्रेरणा और समर्पण से ही सफलता मिलती है। चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ-साथ उन्होंने मिस मध्य प्रदेश प्रतियोगिता में भी भाग लिया, जहां उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण पर एक कविता प्रस्तुत की। दिव्या का यह मानना है कि समाज में खूबसूरती के पारंपरिक मानकों से ऊपर उठकर हमें हर व्यक्ति की वास्तविक खूबसूरती को पहचानना चाहिए। दिव्या ने बताया कि उनका सबसे बड़ा लक्ष्य यह है कि वह अपनी तरह की और भी लड़कियों को प्रेरित कर सकें, जो जीवन में कुछ बड़ा करना चाहती हैं और उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

मध्य प्रदेश के इंदौर से शीतल अग्रवाल, जो वर्तमान में एक आईटी कंपनी की एचआर हेड के तौर पर कार्यरत हैं, ने अपनी यात्रा की शुरुआत इंदौर के गुजराती समाज स्कूल से की थी। उन्होंने बीएससी साइंस की पढ़ाई के बाद एमबीए किया और फिर एचआर क्षेत्र में करियर की शुरुआत की। शीतल अग्रवाल ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी पहली जॉब कंसल्टेंसी कंपनी “सीपी करियर” को दिया, जहाँ से उन्होंने एचआर के बेसिक्स सीखे। 2014 से इन्होंने आईटी सेक्टर में काम करना शुरू किया और तब से लेकर अब तक इस क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।

शीतल अग्रवाल ने अपनी प्रोफेशनल लाइफ के अनुभव साझा करते हुए बताया कि दिल्ली और इंदौर के कार्यशैली में काफी फर्क है। दिल्ली में लोग अधिक प्रतिस्पर्धी होते हैं और यहां प्रोफेशनलिज्म भी अधिक है, जबकि इंदौर में काम करने का माहौल कुछ अधिक दोस्ताना और सहायक है। शीतल ने यह भी बताया कि उनके लिए वर्क-लाइफ बैलेंस बनाना थोड़ा चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उनकी कंपनी ने वर्क-फ्रॉम-होम के विकल्प से उन्हें अपने बच्चों के साथ समय बिताने का मौका दिया, खासकर जब वे छोटे थे।

समाज सेवा की दिशा में शीतल अग्रवाल ने हमेशा अपनी भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा समाज के पिछड़े तबके के बच्चों के लिए काम किया। दिल्ली में रहते हुए, उन्होंने अपने घर में करीब 40 बच्चों को पढ़ाया और फिर मंदिर के परिसर में शिक्षा देने का सिलसिला शुरू किया, जो बाद में 70-80 बच्चों तक बढ़ गया। इस कार्य से उन्होंने बच्चों को न केवल शिक्षा दी, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव भी लाया। शीतल अग्रवाल का मानना है कि समाज सेवा में छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एंकर हर्षिता लालवानी ने हाल ही में अपनी यात्रा के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी मेहनत और जुनून के बल पर इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। एंकरिंग के क्षेत्र में एक लड़की के लिए आगे बढ़ना चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन हर्षिता ने अपनी कड़ी मेहनत और उत्कृष्टता की वजह से 50 से अधिक इवेंट्स में अपनी भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि उनकी करियर की शुरुआत मुश्किलों से हुई, क्योंकि उनके पास खुद का कोई वीडियो प्रूफ नहीं था। फिर भी, फ्रीलांस काम करके और छोटे इवेंट्स से शुरुआत करते हुए उन्हें अपनी पहचान बनाने का मौका मिला।

हर्षिता ने भोपाल के एक अवार्ड सेरेमनी के जरिए अपने करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद, उन्हें कई बड़े इवेंट्स में एंकरिंग का अवसर मिला, जिनमें ‘खेलो इंडिया’ और ‘भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल’ जैसे मेगा इवेंट्स शामिल हैं। हर्षिता ने अपनी सफलता का श्रेय ऑडियंस के साथ अच्छे संवाद और प्रस्तुति की कला को दिया। उनका मानना है कि एक एंकर की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करना और उन्हें सहज महसूस कराना होता है।

आने वाले समय में, हर्षिता ने अपनी उम्मीदें व्यक्त करते हुए कहा कि वह इस क्षेत्र में एक स्थापित नाम बनना चाहती हैं। उनका सपना है कि उन्हें बड़े कॉर्पोरेट शो और अवार्ड सेरेमनी के लिए चुना जाए, और उनका नाम एंकरिंग इंडस्ट्री में एक प्रतिष्ठित नाम बने। हर्षिता ने कहा कि उनके लिए यह एक लंबी यात्रा का हिस्सा है, लेकिन उन्होंने इसे पूरी तरह से स्वीकार किया है और अपनी मेहनत से हर दिन कुछ नया सीखने की कोशिश करती हैं।

 

इंदौर के रामश्री नमकीन की फाउंडर कल्पना रमन ने अपने जीवन के संघर्षों को पार कर एक सफल नमकीन मैन्युफैक्चरिंग बिज़नेस की शुरुआत की है। एक मेकानिकल इंजीनियर के रूप में 20 साल का अनुभव रखने वाली कल्पना ने 2021 में ‘रामश्री नमकीन’ ब्रांड के तहत अपना बिज़नेस शुरू किया। हालांकि यह समय लॉकडाउन का था और काफी चुनौतियाँ थी, फिर भी उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और जुनून से अपने सपनों को साकार किया। उनका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उनके लिए रोजगार के अवसर प्रदान करना था। अपने बेटे को मॉडल बनाकर, कल्पना ने एक नई शुरुआत की और इस बिज़नेस को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

कल्पना के लिए यह यात्रा आसान नहीं थी। उनके बिज़नेस की शुरुआत के महज तीन महीने बाद उनकी माँ का निधन हो गया, जो उनके जीवन का एक बड़ा धक्का था। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाया। उन्होंने महिला सशक्तिकरण को अपने बिज़नेस का हिस्सा बनाते हुए अपनी कंपनी में महिलाओं को रोजगार देने का निर्णय लिया। इस पहल से न सिर्फ उनके बिज़नेस को सफलता मिली, बल्कि उन्होंने कई पुरस्कार भी प्राप्त किए और मध्य प्रदेश शासन के साथ भी अपने प्रोडक्ट्स को बढ़ावा दिया।

कल्पना अब अपने बिज़नेस को और बढ़ाना चाहती हैं और इसके लिए उन्होंने MPID के साथ लैंड और अन्य संसाधनों के लिए बातचीत शुरू कर दी है। उनका सपना है कि ‘रामश्री नमकीन’ को भारत के कोने-कोने तक और विदेशों में भी एक ब्रांड के रूप में स्थापित करें। उनका विश्वास है कि अगर उन्होंने सपना देखा है, तो उसे पूरा करने के लिए वह हर संभव प्रयास करेंगी। इसके साथ ही, वे अपनी पेशेवर और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अपने बिज़नेस को नई ऊँचाइयों तक ले जाना चाहती हैं।

भोपाल की रजिंदर कौर, जो एक टीचर और स्पेशल चाइल्ड काउंसलर हैं, ने जीवन में कई कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी मंजिल हासिल की है। उनका सपना हमेशा से टीचर बनने का था, लेकिन पढ़ाई में अच्छी नहीं होने के कारण उन्हें खुद पर विश्वास नहीं था। बचपन में उन्हें कई बार यह सुनने को मिलता था कि आप कभी टीचर नहीं बन सकतीं, लेकिन रजिंदर ने इसे चुनौती के रूप में लिया और अपने सपने को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की। आज वह एक सफल टीचर और काउंसलर के रूप में प्रसिद्ध हैं।

रजिंदर कौर का जीवन हमेशा से आसान नहीं रहा। शादी के बाद भी उन्हें कई संघर्षों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनके ससुर ने हमेशा उनका समर्थन किया और उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने की सलाह दी। उन्होंने गर्भावस्था के दौरान भी अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता दी और धीरे-धीरे टीचिंग और काउंसलिंग के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। वह न केवल बच्चों को शिक्षा देती हैं, बल्कि स्पेशल चाइल्ड के लिए भी काम करती हैं। उनके द्वारा शुरू की गई काउंसलिंग सेवाएं और स्पेशल एजुकेशन को लेकर किए गए प्रयासों से बहुत से बच्चों को मदद मिली है।

रजिंदर कौर का मानना है कि एक शिक्षक को अपने छात्रों के प्रति पेशेंस और समझ की आवश्यकता होती है। उनके अनुसार, अगर किसी शिक्षक में पेशेंस नहीं है तो वह अपने विद्यार्थियों के साथ सही तरीके से काम नहीं कर सकता। वह अपने अनुभव से कहती हैं कि शिक्षा और काउंसलिंग के क्षेत्र में सफलता पाने के लिए पेशेंस और समर्पण बहुत जरूरी हैं। उन्होंने खासकर उन बच्चों के लिए काम किया है जो शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होते, जैसे व्हीलचेयर पर बैठे बच्चे या ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और समर्थन के माध्यम से ये बच्चे भी अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

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