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महिला उद्यमियों की सफलता की नई कहानी: समाज और उद्योग में रच रहीं इतिहास, वर्किंग विमेन भी आगे…

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नई दिल्ली। अपने जुनून और कड़ी मेहनत से कई महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता की नई इबारत लिखी है। जयपुर के एलन कॉलेज ऑफ़ डिज़ाइन की प्रोफेसर प्रीति रखयानी ने डिजाइनिंग के क्षेत्र में कई युवाओं को प्रेरित किया और सीमा गार्गव ने प्राकृतिक कॉस्मेटिक्स में अपनी अलग पहचान बनाई, जबकि इंदौर की प्रीति चौहान पंजाबी ने मिलेट्स उद्योग में नए कीर्तिमान स्थापित किए। महू की ज्योति कासलीवाल ने अपने संघर्ष के बल पर ‘अपूर्व कलेक्शन’ को एक लोकप्रिय ब्रांड बनाया, वहीं युवा उद्यमी आयुषी सिंह ने समाज सुधार की दिशा में उल्लेखनीय योगदान दिया। ये सभी महिलाएं न केवल अपनी मेहनत और समर्पण से सफलता की मिसाल बनी हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित कर रही हैं।

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जयपुर के एलन कॉलेज ऑफ़ डिज़ाइन की प्रोफेसर प्रीति रखयानी ने साझा किया अपना सफर


जयपुर के एलन कॉलेज ऑफ़ डिज़ाइन और फैशन की प्रोफेसर प्रीति रखयानी ने अपने करियर की शुरुआत से लेकर अब तक के सफर को साझा किया। उन्होंने बताया कि बचपन से ही उन्हें ड्राइंग और पेंटिंग में रुचि थी, लेकिन तब यह नहीं पता था कि फैशन डिज़ाइनिंग भी एक करियर विकल्प हो सकता है। उन्होंने शुरुआत में फैशन डिज़ाइनिंग में डिप्लोमा किया और फिर टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी (IIFT), भोपाल से तीन साल का एडवांस डिप्लोमा पूरा किया, जिससे उनके करियर को नई दिशा मिली।

उन्होंने अपने करियर में पढ़ाई के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी योगदान दिया। भोपाल में उन्होंने फैशन इलस्ट्रेशन फैकल्टी के रूप में पढ़ाना शुरू किया और धीरे-धीरे सीनियर प्रोफेसर के पद तक पहुंचीं। इसके बाद, जयपुर में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के दौरान उन्हें स्कॉलरशिप और अकादमिक अचीवमेंट अवॉर्ड्स भी मिले। उन्होंने बताया कि पढ़ाने से उन्हें खुद को भी सीखने का अवसर मिला और वे अपने छात्रों को डिज़ाइनिंग की गहराई से समझाने का प्रयास करती हैं। कोविड-19 के दौरान उन्होंने विभिन्न फ्रीलांस प्रोजेक्ट्स किए और बाद में एकेडमिक हेड के रूप में भी काम किया।

फैशन सेंस को लेकर उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान की तुलना की। उनका मानना है कि दोनों राज्यों की फैशन संस्कृति अलग-अलग है। मध्य प्रदेश अपने हाथ के काम, ज़रदोज़ी और पोटली बैग्स के लिए जाना जाता है, जबकि राजस्थान प्रिंटिंग, सांगानेरी और बगरू प्रिंट के लिए मशहूर है। उन्होंने बताया कि एक डिज़ाइनर के लिए सोच और कल्पनाशक्ति सबसे महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यही उन्हें कुछ नया और अनोखा बनाने के लिए प्रेरित करती है।

 

इंदौर की सीमा गार्गव ने प्राकृतिक कॉस्मेटिक्स की दुनिया में बनाई अलग पहचान

मध्य प्रदेश के इंदौर से ब्यूटीशियन और फॉर्मूलेटर सीमा गार्गव ने अपने बचपन के शौक को करियर में बदलते हुए ब्यूटी इंडस्ट्री में नई पहचान बनाई। नब्बे के दशक में एक ब्यूटी पार्लर के साथ अपने सफर की शुरुआत करने वाली सीमा को जल्द ही केमिकल युक्त उत्पादों के दुष्प्रभावों का एहसास हुआ। इसके बाद, उन्होंने आयुर्वेदिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया और प्राकृतिक फॉर्मूलेशन विकसित किए। उनके पास पहले से ही एक बड़ा ग्राहक आधार था, जिससे उन्हें अपने नए उत्पादों को प्रभावी ढंग से परखने और सुधारने का अवसर मिला।

2015 में, सीमा ने अपनी खुद की कंपनी ‘अंगरग ऑर्गेनिक्स’ की शुरुआत की, जिसमें वे पूरी तरह से नेचुरल और खाने योग्य सामग्री से बने कॉस्मेटिक्स तैयार करती हैं। हालांकि, कोरोना महामारी के कारण उनका व्यवसाय कुछ वर्षों के लिए ठप हो गया, लेकिन 2022 में उन्होंने एक बार फिर मजबूती से वापसी की। उनकी कंपनी आज स्किन और हेयर केयर के कस्टमाइज़ प्रोडक्ट्स प्रदान करती है। वे एक काउंसलर के रूप में भी काम करती हैं, जिससे ग्राहकों को उनकी स्किन और हेयर से जुड़ी समस्याओं के लिए सही समाधान मिल सके।

सीमा के अनुसार, बाल झड़ने, सफेद बाल, डैंड्रफ और पिगमेंटेशन जैसी समस्याओं के पीछे मुख्य रूप से केमिकल युक्त उत्पादों का अत्यधिक उपयोग, प्रदूषण और हार्मोनल असंतुलन जिम्मेदार हैं। वे लोगों को जागरूक करने के लिए व्यक्तिगत और टेलीफोनिक काउंसलिंग देती हैं। उनका मानना है कि बार-बार कॉस्मेटिक्स बदलना स्किन और हेयर की समस्याओं को बढ़ा सकता है, इसलिए उत्पादों को समझदारी से चुनना चाहिए और विशेषज्ञों से सलाह लेना जरूरी है।

इंदौर की प्रीति चौहान पंजाबी ने मिलेट्स उद्योग में रचा इतिहास

मध्य प्रदेश के इंदौर से उद्यमी प्रीति चौहान पंजाबी ने 2020 में ‘लक्ष्यराज मिलेट्स’ की स्थापना की। इस सफर की प्रेरणा उन्हें तब मिली जब गर्भावस्था के दौरान उन्हें शुगर की समस्या हुई और उन्होंने अपने खान-पान में मिलेट्स को शामिल कर इसे नियंत्रित किया। इसके बाद उन्होंने इस प्राचीन अन्न के फायदों पर रिसर्च की और हेल्दी स्नैक्स विकसित किए। उनका उद्देश्य लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और उन्हें शुद्ध, बिना प्रिजर्वेटिव वाले मिलेट-आधारित उत्पाद उपलब्ध कराना था। अपनी यात्रा की शुरुआत उन्होंने डोर-टू-डोर मार्केटिंग से की, जिससे उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और उनका ब्रांड तेजी से लोकप्रिय हुआ।

भारत में फैला लक्ष्यराज मिलेट्स का नेटवर्क

कम समय में ही प्रीति चौहान ने अपने उत्पादों को नागपुर, रायपुर, अहमदाबाद, भोपाल और पुणे तक पहुंचाया। उन्होंने फाइव-स्टार होटलों और लाइफस्टाइल एग्जीबिशन में भी अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया, जिससे कई प्रतिष्ठित ब्रांड्स से जुड़ने का मौका मिला। उनके उत्पाद ग्लूटेन-फ्री हैं और इनमें किसी प्रकार का हानिकारक केमिकल नहीं होता, जिससे ये डायबिटीज़ और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए फायदेमंद हैं। हाल ही में उन्होंने राजस्थान के एक बड़े इवेंट में मिलेट्स के लाभों पर अपने विचार रखे, जहां वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी उनके प्रयासों की सराहना की।

मध्य प्रदेश से वैश्विक स्तर तक ले जाने का सपना

प्रीति चौहान का अगला लक्ष्य अपने ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाना है। वे चाहती हैं कि मध्य प्रदेश के किसान मिलेट्स की खेती को अपनाएं, जिससे जल संकट का समाधान भी हो सके और लोगों को पोषक तत्वों से भरपूर अनाज मिले। उनकी रणनीति सिर्फ स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे मिलेट्स को बच्चों और युवाओं तक पहुंचाने के लिए आकर्षक पैकेजिंग और स्वादिष्ट फ्लेवर्स पर भी ध्यान दे रही हैं। उनका मानना है कि सही आहार से न केवल बीमारियों से बचाव किया जा सकता है, बल्कि एक स्वस्थ भविष्य की नींव भी रखी जा सकती है।

महू की ज्योति कासलीवाल ने संघर्ष से बनाई ‘अपूर्व कलेक्शन’ की पहचान

मध्य प्रदेश के महू की रहने वाली ज्योति कासलीवाल ने 1992 में अपने व्यवसाय ‘अपूर्व कलेक्शन’ की शुरुआत की। उस समय उन्होंने अपने घर से ही सिलाई का काम शुरू किया। सीमित संसाधनों के बावजूद, उन्होंने एक सिलाई मशीन से बैग और अन्य लेडीज आइटम बनाकर अपनी उद्यमशीलता यात्रा शुरू की। शुरुआत में, वे अकेले ही उत्पाद तैयार करती थीं और घर-घर जाकर उन्हें बेचती थीं। इसके साथ ही, उन्होंने सिलाई सिखाने की कक्षाएँ भी शुरू कीं, जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हुआ। धीरे-धीरे, उनकी मेहनत रंग लाई, और उनके बिजनेस ने रफ्तार पकड़ी।

संघर्ष से सफलता तक की कहानी

अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए ज्योति को इंदौर से कच्चा माल लाना पड़ता था, जिसके लिए उन्हें 25 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी। शुरुआती दिनों में, वे ब्लू बस और टेम्पो का सहारा लेकर सस्ते दामों पर सामग्री खरीदती थीं और उसे महू लाकर बैग और अन्य लेडीज आइटम तैयार करती थीं। इस कठिन यात्रा और संघर्ष के बावजूद, उन्होंने अपने व्यवसाय को कभी रुकने नहीं दिया। आज, तीन दशकों बाद, उनके पास 10 से अधिक कारीगर काम कर रहे हैं, जिनमें कई महिलाएँ भी शामिल हैं। उनका कहना है कि यह व्यवसाय केवल उनके लिए नहीं, बल्कि उन 10 परिवारों की आजीविका का भी साधन है, जो सालों से उनके साथ जुड़े हुए हैं।

भविष्य की योजनाएँ और सामाजिक योगदान

ज्योति कासलीवाल का बिजनेस मुख्य रूप से लेडीज बैग, ट्रैवलिंग बैग, ब्राइडल सेट, साड़ी कवर और अन्य उपयोगी उत्पादों का निर्माण करता है। वे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के बजाय उसे स्थिर बनाए रखना चाहती हैं, ताकि उनके साथ काम करने वाले कारीगरों का रोजगार बना रहे। हालाँकि, वे मानती हैं कि यदि भविष्य में अच्छा अवसर मिलता है, तो वे इसे और विस्तार देने के बारे में सोच सकती हैं। उनका मुख्य उद्देश्य जरूरतमंद लोगों को रोजगार प्रदान करना और आत्मनिर्भर बनाना है, जिससे वे भी अपने परिवार का बेहतर भविष्य बना सकें।

युवा उद्यमी आयुषी सिंह का समाज सुधार की दिशा में अनूठा प्रयास

भोपाल की युवा उद्यमी आयुषी सिंह ने अपने करियर की शुरुआत एक वकील के रूप में की, लेकिन जल्द ही उन्होंने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की ठानी। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर एक ऐसा प्लेटफॉर्म विकसित किया, जहां वे युवा पीढ़ी को रोजगार के अवसर प्रदान कर सकें और समाज में लीगल अवेयरनेस फैला सकें। उनकी इस पहल का मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है, जिससे वे अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें।

अपने इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए आयुषी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनुभव प्राप्त किया। उन्होंने हॉवर्ड यूनिवर्सिटी में ह्यूमन राइट्स डेवलपमेंट पर अध्ययन किया और संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों के साथ मिलकर सामाजिक न्याय के विभिन्न पहलुओं को समझा। भारत लौटने के बाद, उन्होंने भोपाल में कानूनी जागरूकता अभियान शुरू किया, विशेष रूप से स्कूलों और कॉलेजों में, ताकि युवाओं को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित किया जा सके। उनका मानना है कि अगर बच्चे अपने अधिकारों को पहचानेंगे, तो वे खुद को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बना सकेंगे।

आयुषी सिंह का अगला कदम इस पहल को और व्यापक बनाना है। वे सरकार के सहयोग से इसे बड़े पैमाने पर ले जाने की योजना बना रही हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इस जागरूकता अभियान से जुड़ सकें। उनका मानना है कि जब तक समाज के प्रत्येक व्यक्ति को उसके अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं होगी, तब तक न्यायपूर्ण और सुरक्षित समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। उनका प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।