db News Network

Home » कांग्रेस और DMK का समर्थन ,दुनिया के लिए अंग्रेजी, तमिल है मातृभाषा

कांग्रेस और DMK का समर्थन ,दुनिया के लिए अंग्रेजी, तमिल है मातृभाषा

0 comments 91 views 2 minutes read

नई दिल्ली। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की ओर से लागू त्रि-भाषा फॉर्मूले का तमिलनाडु में शुरू हुआ विरोध लगातार बढ़चा जा रहा है। इस मामले को लेकर डीएमके के सांसदों ने सोमवार को लोकसभा और राज्यसभा में विरोध जताया तो वहीं शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने एक बयान के लिए माफी तक मांगनी पड़ गई। डीएमके का कहना है कि त्रि-भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी को तमिलनाडु में थोपने का प्रयास किया जा रहा है, जो गलत है। इसे हम स्वीकार नहीं करेंगे। इस बीच कांग्रेस ने भी डीएमके की ही भाषा बोलना शुरू कर दिया है। कांग्रेस का कहना है कि तमिलनाडु में दो ही भाषाएं पर्याप्त हैं। वहां तीसरी भाषा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

तमिलनाडु कांग्रेस के नेता और सांसद कार्ति चिदंबरम ने कहा, ‘तमिलनाडु का रुख स्पष्ट है कि दो भाषा का फॉर्मूला पर्याप्त है। तमिल भाषा हमारी पहचान है और मातृभाषा है। इंग्लिश इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया से संपर्क उसके माध्यम से हो सकता है। साइंस और कॉमर्स को समझने के लिए इंग्लिश की जरूरत है। लेकिन हमें तीसरी अनिवार्य भाषा की जरूरत नहीं है। मंत्री को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने अपना बयान वापस ले लिया है, लेकिन माफी भी मांगनी होगी।’ कार्ति चिदंबरम के इस रुख से साफ है कि कांग्रेस भी भाषा विवाद में डीएमके का ही रुख अपनाएगी। तमिलनाडु में हिंदी बनाम तमिल का मसला खड़ा हो गया है और डीएमके को लगता है कि इसके जरिए वह आसानी से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को जीत सकती है।

भाषा का मसला तमिलनाडु में संवेदनशील विषय है। ऐसे में यह मसला भाजपा के लिए भी चिंता का सबब बन गया है। दरअसल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि त्रिभाषा फॉर्मूले को लेकर पहले तमिलनाडु की ओर से सहमति जताई गई थी। इसी के कारण राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे शामिल किया गया था, लेकिन बाद में तमिलनाडु सरकार का रुख पलट गया। वहीं डीएमके का कहना है कि उसकी ओर से ऐसा कोई भरोसा नहीं दिया गया था।

एमके स्टालिन ने परिसीमन को भी बना लिया है मुद्दा
बता दें कि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने परिसीमन को भी मुद्दा बना दिया है। उनका कहना है कि यदि जनगणना के नए आंकड़ों को आधार बाते हुए परिसीमन किया गया तो फिर तमिलनाडु की सीटें कम हो सकती हैं। उन्होंने इस मामले में केरल, कर्नाटक जैसे दूसरे दक्षिणी राज्यों को भी शामिल कर लिया है। आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू भी जनता से आबादी बढ़ाने की अपील कर रहे हैं।

Leave a Comment

चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।