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महिलाओं की बदलती परिभाषा: शिक्षा, उद्यमिता और सृजन के जरिए समाज को दिशा देती आवाजें

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नई दिल्ली। नई दिल्ली। मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों से उभरी इन प्रभावशाली महिलाओं की कहानियाँ आज प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। भोपाल की संगीता पाठक ने अन्नपूर्णा फूड्स के ज़रिए आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की, तो वहीं नोएडा की शिक्षाविद डॉ. प्रियंका सिंह ने तकनीकी युग में बच्चों की जड़ों से जुड़ी शिक्षा को प्राथमिकता दी। नेहा जैन ने अपने घर से शुरू किए गए पैकिंग और इवेंट के काम को “शुभ काज” जैसे पहचान वाले ब्रांड में बदल दिया, जिससे कई महिलाओं को रोज़गार मिला। वहीं मानसी सिंह ने अपने जुनून को व्यवसाय में बदलते हुए “द गेट बंधन” के ज़रिए इवेंट इंडस्ट्री में एक नई पहचान बनाई। तो वहीं रिचा श्रीवास्तव ने ख़ुद की पहचान बनाई। कला, शिक्षा, व्यवसाय और सेवा के इन क्षेत्रों में इन सभी महिलाओं ने दिखाया कि सशक्तिकरण सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक सतत प्रयास और दृष्टिकोण है।

हथेली का स्वाद, दुनिया की उड़ान: भोपाल की अन्नपूर्णा फूड्स की कहानी

भोपाल की महिला उद्यमी संगीता पाठक ने अपने घरेलू किचन से शुरू किए गए अचार और चटनी के व्यवसाय को “अन्नपूर्णा फूड्स” के नाम से एक संगठित स्टार्टअप में बदल दिया है। शुरुआत में अपने पति की सहमति और प्रोत्साहन से, संगीता जी ने खुले में तैयार कर अचार बेचना शुरू किया। उन्होंने  2021 से  इस व्यवसाय को रजिस्ट्रेशन, पैकेजिंग और लेबलिंग के साथ व्यवस्थित रूप में ढालते हुए बाजार में उतारा। आज उनकी प्रोडक्ट्स को विभिन्न एग्ज़िबिशन में जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है और उनका परिवार – पति और बच्चे – इस काम में उनका भरपूर साथ दे रहा है।

संगीता पाठक का काम पूरी तरह से ऑर्गेनिक है और निर्माण की पूरी प्रक्रिया वे स्वयं देखती हैं। छत्तीसगढ़ से खास मसाले मंगवाकर वे अपने प्रोडक्ट्स को विशिष्ट स्वाद देती हैं। उनके साथ दो महिलाएं, दो लड़के और एक विश्वसनीय मेड काम करते हैं। “मैं खुद हर सामग्री की मात्रा, गुणवत्ता और साफ-सफाई पर नजर रखती हूँ,” वे कहती हैं। उन्होंने भोपाल में कई कुकिंग कॉम्पिटिशन जीते हैं और उनके बनाएं प्रोडक्ट्स – जैसे लेमन राइस मिक्स, ड्राई चटनियां, मट्ठे वाली मिर्ची – बेहद लोकप्रिय हो चुके हैं।

उनका सपना है कि अन्नपूर्णा फूड्स को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया जाए। आज उनके प्रोडक्ट्स कनाडा, दुबई, पुणे, मुंबई, हैदराबाद, अहमदाबाद और अपने मायके छत्तीसगढ़ तक में पहुँच चुके हैं। संगीता पाठक मानती हैं कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और हर महिला को कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए, ईमानदारी और शुद्धता के साथ। उनका यह आत्मविश्वास और संघर्ष, अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा देने वाला है।

एमपी की रिचा की संघर्ष से सफलता की कहानी… रिचा की ज़ुबानी, अपने दम पर बनाई इवेंट वर्ल्ड में पहचान

भोपाल की रिचा श्रीवास्तव ने अपने डांस और कला के प्रति जुनून को “रिचा डांस एंड आर्ट स्टूडियो” के रूप में एक सशक्त पेशेवर मंच में बदला है। मात्र 8 वर्ष की आयु से भरतनाट्यम में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकीं रिचा ने संस्कृत नाटिका में भागीदारी से लेकर उसे सिखाने तक का सफर तय किया। उज्जैन से शुरुआत कर, वे धीरे-धीरे विवाह समारोह, कॉर्पोरेट इवेंट्स और फेस्टिवल आयोजनों का हिस्सा बनीं। बॉम्बे की एक प्रतिष्ठित कंपनी से मिले पहले कॉर्पोरेट ऑफर ने उनके करियर को एक नई दिशा दी, जिसके बाद उन्होंने भोपाल, रायपुर, जयपुर, मुंबई जैसे शहरों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

रिचा का उद्देश्य केवल एक सफल कलाकार बनना नहीं था, बल्कि महिलाओं और बच्चियों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना भी है। वे होली, दिवाली और महिला सशक्तिकरण से जुड़े आयोजनों का आयोजन करती हैं और चाहती हैं कि अधिक से अधिक महिलाएं अपनी प्रतिभा को पहचानें और उसे मंच दें। उनका मानना है कि कला और संस्कृति केवल शौक नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भरता का माध्यम भी हो सकता है। उन्होंने अब तक लगभग 200 से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से कई को वे ऑनलाइन अंतरराष्ट्रीय मंचों के जरिए भी सिखा रही हैं।

रिचा स्वीकार करती हैं कि शुरुआत में अस्वीकार और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, खासकर नए शहरों में खुद को स्थापित करने में, लेकिन उनके परिवार – विशेष रूप से पति – का निरंतर सहयोग उनके आत्मविश्वास की कुंजी बना। आज वे न सिर्फ एक सफल डांसर और प्रशिक्षक हैं, बल्कि भारत में कला संस्कृति की प्रतिनिधि बनने का सपना भी रखती हैं। उनका कहना है, “अगर आत्मविश्वास और परिवार का साथ हो, तो कोई भी महिला किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकती है।”

नोएडा की शिक्षाविद डॉ. प्रियंका सिंह: “तकनीक के दौर में जड़ों से जुड़े रहना ज़रूरी

नोएडा स्थित द क्रेयॉन्स स्कूल की एसोसिएटेड डायरेक्टर डॉ. प्रियंका सिंह की पेशेवर यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है। फाइनेंस और ऑडिट की दुनिया से शिक्षा जगत में कदम रखने वाली डॉ. सिंह ने 2015 में जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ पर यह निर्णय लिया कि वे बच्चों के साथ काम करना चाहती हैं। उन्होंने बेसिक स्तर से शुरू करते हुए शिक्षा में दोबारा करियर बनाया और आज देशभर में 40 से अधिक स्कूल फ्रैंचाइज़ी की ट्रेनिंग और ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं। वे न केवल फिजिकल और ऑनलाइन ट्रेनिंग सत्र आयोजित करती हैं, बल्कि शिक्षा में इनोवेशन और संस्कार दोनों के समन्वय की पक्षधर हैं। हाल ही में उनके स्कूल का फिनलैंड के विश्वप्रसिद्ध फिनिश करिकुलम से टाई-अप हुआ है, जिससे बच्चों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता की शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।

डॉ. सिंह का मानना है कि हर बच्चे के भीतर कोई न कोई विशिष्टता होती है, जिसे पहचानकर सहेजना शिक्षक की जिम्मेदारी होती है। उनका इंटेन्शनल टीचिंग मॉडल इसी विचार पर आधारित है, जहां हर बच्चे को उसकी ज़रूरत के अनुसार शिक्षित किया जाता है। कोविड के बाद शिक्षा जगत में डिजिटल साधनों का बढ़ता उपयोग उनके लिए चिंता का विषय है। वे स्पष्ट रूप से मानती हैं कि अर्ली एजुकेशन के दौरान बच्चों को मोबाइल और टैबलेट से दूर रखना चाहिए, क्योंकि इनका अत्यधिक उपयोग बच्चों की आंखों, बोलने की क्षमता और मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव डालता है। इसीलिए वे पेरेंट काउंसलिंग पर खास ध्यान देती हैं और अभिभावकों को समझाने का प्रयास करती हैं कि तकनीक के साथ-साथ बच्चों को मूल्य और संस्कृति से भी जोड़ना आवश्यक है।

अपने नेतृत्व में डॉ. सिंह न केवल शिक्षकों को प्रशिक्षित कर रही हैं बल्कि अभिभावकों को भी शिक्षा प्रणाली में सक्रिय रूप से शामिल कर रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा केवल स्कूल तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उसमें माता-पिता, शिक्षक और विद्यार्थी – इन तीनों का तालमेल बेहद आवश्यक है। वर्तमान समय में जब पेरेंट्स तकनीकी युग की ओर झुकाव रखते हैं, तब उन्हें अपनी जड़ों, मूल्यों और परंपराओं से जोड़ना सबसे महत्वपूर्ण काम है। डॉ. प्रियंका सिंह की सोच भविष्य की शिक्षा को दिशा देने वाली है, जो परंपरा और तकनीक दोनों को संतुलित रूप से अपनाने की प्रेरणा देती है।

एमपी की नेहा की जज़्बे से सफलता की कहानी… नेहा की ज़ुबानी, अपने दम पर बनाई वेडिंग इवेंट वर्ल्ड में ख़ुद की पहचान

भोपाल की नेहा जैन ने पारंपरिक पैकिंग और इवेंट सर्विस को अपनी मेहनत और हुनर से “शुभकाज बाय नेहा” के रूप में एक नई पहचान दी है। 2015 में इस वेंचर की औपचारिक शुरुआत भले हुई हो, लेकिन इसकी नींव तब पड़ी जब उन्होंने 2002 में अपनी बेटी के जन्म के बाद घर से काम करने का निर्णय लिया। शुरूआत में खुद की शादी की पैकिंग से प्रेरणा लेकर उन्होंने सगाई, शादी और अन्य शुभ अवसरों की हैंडमेड गिफ्ट पैकिंग का काम आरंभ किया। नाम “शुभकाज” इसलिए चुना क्योंकि यह हर सकारात्मक अवसर को समेटे हुए है, और यह उनका व्यक्तिगत ब्रांड बना, जिसमें नेहा का नाम और अनुभव झलकता है।

शुरुआती दिनों में उन्हें फाइनैंशल चुनौतियों का सामना करना पड़ा, खासकर बिना स्टॉक के महंगे दामों पर सामग्री खरीदनी पड़ी। लेकिन धीरे-धीरे विश्वास बना और काम बढ़ा। दिल्ली-बॉम्बे जाकर खुद सामान इकट्ठा करना, परिवार और प्रोफेशनल जीवन में संतुलन बनाना, सबकुछ एक संघर्ष रहा। उनके पति, मां और सास ने मिलकर उन्हें घर की जिम्मेदारी से राहत दी, जिससे नेहा अपने काम पर ध्यान दे सकीं। आज शुभकाज केवल एक इवेंट पैकिंग सेवा नहीं है, बल्कि भोपाल की लड़कियों, खासकर स्लम और एनजीओ से जुड़ी युवतियों को काम देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम भी बन चुका है।

नेहा जैन का मानना है कि आज के दौर में ग्राहक “इंस्टाग्राममेबल” अनुभव चाहते हैं – हर गिफ्ट, हर पैकिंग एक फोटो की तरह परफेक्ट होनी चाहिए। यही बदलती सोच इस क्षेत्र का स्कोप और भी बढ़ा रही है। बातचीत की कला, वादों को पूरा करने की विश्वसनीयता और गुणवत्ता उनकी सफलता की कुंजी रही है। भविष्य में वे इस काम को बहुत आगे ले जाने के बजाय, अपनी बेटी और परिवार को समय देना चाहती हैं, जबकि नई पीढ़ी को इस कार्य में ट्रेन कर रही हैं ताकि वे भी आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें। नेहा की यह सोच बाजारवाद से परे एक मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में विरल है।

भोपाल की मानसी सिंह: पैशन से पेशा बना ‘द गेट बंधन’, इवेंट इंडस्ट्री में रच रही नई कहानी

भोपाल की मानसी सिंह ने 2021 में “द गेट बंधन” नामक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की शुरुआत की, जो आज मध्य प्रदेश में तेजी से अपनी पहचान बना रही है। कॉलेज जीवन से ही इवेंट्स में रुचि रखने वाली मानसी ने पहले फ्रीलांस काम करके अनुभव लिया, फिर इवेंट मैनेजमेंट में डिप्लोमा कर अकादमिक और प्रैक्टिकल दोनों स्तरों पर खुद को तैयार किया। वे कॉर्पोरेट इवेंट्स, वेडिंग्स, लाइव शोज़ और सरकारी कार्यक्रमों तक का सफलतापूर्वक आयोजन कर चुकी हैं, जिनमें हाल ही में भोपाल में हुआ एक ग्लोबल समिट शामिल है, जिसमें उनकी कंपनी ने पूर्ण मैनपावर सपोर्ट दिया।

अब तक 50 से अधिक इवेंट्स का आयोजन कर चुकीं मानसी, खुद के भी कार्यक्रम जैसे गरबा महोत्सव और एग्ज़िबिशन आयोजित करती हैं। वे मानती हैं कि एक सफल वेडिंग प्लानर को क्लाइंट सर्विसिंग, हॉस्पिटालिटी (RSVP), और प्रोडक्शन मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार, इवेंट इंडस्ट्री में अभी भी आम लोगों के बीच इसकी महत्ता और प्रोफेशनल स्किल्स की पूरी समझ नहीं है, लेकिन आने वाले वर्षों में इवेंट प्लानिंग एक बड़ी ज़रूरत बनकर उभरेगी, खासकर शहरी और सेमी-अर्बन क्षेत्रों में।

भविष्य को लेकर मानसी का सपना और भी बड़ा है। वे न केवल भोपाल को इवेंट हब बनाना चाहती हैं, बल्कि प्रसिद्ध सिंगर अर्जित सिंह का एक मेगा लाइव शो भोपाल में खुद ऑर्गनाइज़ करना चाहती हैं। उनका विश्वास है कि अगर प्रदेशों को पर्याप्त मंच और संसाधन मिले, तो मध्य प्रदेश जैसे राज्य भी दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े इवेंट डेस्टिनेशनों को टक्कर दे सकते हैं। मानसी की ये सोच न केवल उनके जुनून को दर्शाती है, बल्कि युवाओं के लिए भी प्रेरणा है कि यदि इरादा मजबूत हो, तो हर मंच पर नाम संभव है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।