db News Network

Home » महिलाओं की प्रेरक कहानियां: आत्मनिर्भरता, कला और जीवन बदलने वाली पहल का अनूठा संगम

महिलाओं की प्रेरक कहानियां: आत्मनिर्भरता, कला और जीवन बदलने वाली पहल का अनूठा संगम

0 comments 1.4K views 7 minutes read

MP Desk: भोपाल की तीन प्रेरणादायक महिलाओं ने अपने हुनर और मेहनत से न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव की मिसाल पेश की है। इनमें से एक ने रेकी के जरिए जीवन बदलने वाले अनुभव साझा किए, दूसरी ने आर्ट एंड क्राफ्ट के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भरता की राह दिखाई, और तीसरी ने रेजिन आर्ट के जरिए क़ीमती यादों को प्रिज़र्व करने की अनूठी पहल की।

@media (max-width: 767px) { .elementor-image-box-title { margin-bottom: 0px; margin-top: 20px; } }

मध्यप्रदेश के भोपाल में रेकी मास्टर और हीलर अनीता गुप्ता ने रेकी और उसके सकारात्मक प्रभावों के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि रेकी एक जापानी टच हीलिंग थेरेपी है, जो मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्तर पर गहरे प्रभाव डालती है। अनीता का कहना है कि रेकी से न केवल तनाव दूर होता है, बल्कि आत्मविश्वास, रचनात्मकता और इम्यूनिटी भी बढ़ती है। उन्होंने अपनी संस्था “कॉस्मिक रिदम” का उल्लेख किया, जो पारंपरिक और प्रामाणिक रेकी सिखाने वाली भारत की प्रमुख संस्थाओं में से एक है।

अनीता गुप्ता ने अपने जीवन के संघर्ष भरे दिनों का ज़िक्र करते हुए बताया कि उनके पति के निधन के बाद उन्हें गंभीर वित्तीय समस्याओं और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उस कठिन समय में रेकी ने न केवल उन्हें मानसिक और भावनात्मक शक्ति दी, बल्कि उनके जीवन को सकारात्मक दिशा भी दी। अनीता ने रेकी को अपनाकर न केवल अपनी बेटियों की परवरिश की, बल्कि अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू किया। उनकी दोनों बेटियां आज इंजीनियर हैं, और अनीता ने खुद रेकी मास्टर बनकर कई लोगों की जिंदगी में बदलाव लाया।

रेकी की transformative शक्ति को लेकर अनीता ने कहा कि यह न केवल आत्मविश्वास को बढ़ाती है, बल्कि जीवन के नकारात्मक पहलुओं को भी दूर करने में मदद करती है। उन्होंने अपनी स्कूटी से लेकर कार तक का सफर और जीवनशैली में आए बदलावों को रेकी के सकारात्मक प्रभाव का परिणाम बताया। उनका मानना है कि सही दिशा और प्रामाणिक शिक्षण से रेकी का गहरा और जल्दी असर होता है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए लोगों को रेकी को अपनाने और खुद इसे सीखने का सुझाव दिया।

भोपाल की रहने वाली और “इशिका क्रिएशंस” की फाउंडर सीमाक्षी शर्मा ने 2014 में अपनी कला और शौक को व्यवसाय में बदलने का सफर शुरू किया। शादी के बाद सीमाक्षी को समय की कमी के कारण अपने शौक को जारी रखना मुश्किल हो गया, लेकिन जब उनके बच्चे बड़े हुए, तो उन्होंने अपने आर्ट और क्राफ्ट के शौक को फिर से अपनाया। सीमाक्षी ने छोटी-छोटी क्राफ्टिंग वस्तुएँ जैसे तोरण, शुभ लाभ, और क्ले आइटम बनाना शुरू किया, जो दोस्तों और पड़ोसियों को बहुत पसंद आईं। जल्द ही उन्हें किटी पार्टियों और अन्य आयोजनों के लिए ऑर्डर मिलने लगे, और उनके काम को नई पहचान मिली।

सीमाक्षी ने बताया कि उनके व्यवसाय को “ब्राह्मण क्लब” और अन्य समूहों से बहुत सहयोग मिला, जिसने उनके स्टार्टअप को नई दिशा दी। उनका मुख्य उत्पाद करवाचौथ थाली, शुभ लाभ, और अन्य पारंपरिक क्राफ्ट आइटम हैं, जिन्हें ग्राहक बहुत पसंद करते हैं। शुरू में परिवार से समर्थन न मिलने के बावजूद, उनके काम की सराहना और बढ़ते ऑर्डर ने उनकी मेहनत को मान्यता दी। अब परिवार भी उनके साथ है, और सीमाक्षी अपने उत्पादों की मार्केटिंग घर से ही करती हैं। वह स्थानीय प्रदर्शनियों में स्टॉल लगाती हैं और ऑर्डर्स को खुद मैनेज करती हैं, जिसमें कई बार दूर-दराज के स्थानों से भी डिलीवरी होती है।

सीमाक्षी का उद्देश्य अपने काम के जरिए महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करना है। वह चाहती हैं कि महिलाएँ अपने घर से ही आर्ट और क्राफ्ट का काम शुरू करें और आत्मनिर्भर बनें। उन्होंने जबलपुर में कई फ्री वर्कशॉप आयोजित की हैं, जहाँ वह महिलाओं को आर्ट और क्राफ्ट सिखाती हैं। सीमाक्षी का मानना है कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें महिलाएँ घर बैठे काम कर सकती हैं और अपने कौशल का उपयोग करके आर्थिक रूप से मजबूत बन सकती हैं। उनके इस प्रयास ने न केवल उनके जीवन को बदला है, बल्कि कई अन्य महिलाओं को भी प्रेरणा दी है।

भोपाल की ऋचा जैन, जो “फ़ितूर बाय ऋचा” की फाउंडर हैं, ने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान अपनी क्रिएटिविटी को फिर से खोजा और इसे एक सफल स्टार्टअप में बदल दिया। शादी के बाद व्यस्तता के कारण अपनी कला से दूर हो चुकी ऋचा ने लॉकडाउन के खाली समय का उपयोग कर रेसिन आर्ट की बारीकियाँ ऑनलाइन सीखीं। रेसिन आर्ट एक अनूठा तरीका है, जिसमें यादों को सहेजने वाले आइटम्स जैसे शादी की वरमाला, बेबी की प्रेग्नेंसी डीटेल्स, और एम्बिलिकल कॉर्ड को सुंदर फ्रेम्स में प्रिज़र्व किया जाता है। यह न केवल उन पलों को सहेजने का काम करता है, बल्कि इंटीरियर डेकोरेशन का भी हिस्सा बनता है।

ऋचा का कहना है कि शादी की वरमाला को प्रिज़र्व करने का ट्रेंड आजकल काफी लोकप्रिय हो गया है, क्योंकि वरमाला हर शादी का एक खास हिस्सा होती है। फूलों को रेसिन आर्ट के जरिए ड्राई करके संरक्षित किया जाता है, जिससे वे हमेशा ताजगी बनाए रखते हैं। यह कला शादी के सीजन में बेहद डिमांड में रहती है। ऋचा के मुताबिक, एक फ्रेम तैयार करने में लगभग 15-20 दिन लगते हैं। उनके द्वारा बनाए गए वॉल पीस, फोटो फ्रेम्स, और अन्य इंटीरियर आइटम्स को ग्राहकों से शानदार रिस्पॉन्स मिल रहा है।

अपने स्टार्टअप को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ाने के लिए ऋचा ने अपनी ग्राफिक्स और डिजिटल मार्केटिंग स्किल्स का बखूबी इस्तेमाल किया। इंस्टाग्राम पर “फ़ितूर बाय ऋचा” के नाम से उनका पेज है, जहां से उन्हें ग्राहक मिलते हैं। उनकी मुख्य मार्केटिंग स्ट्रेटेजी ग्राहकों से मिली प्रशंसा और वर्ड-ऑफ-माउथ पर आधारित है। ऋचा ने बच्चों और युवाओं को आर्ट में शामिल करने के लिए वर्कशॉप्स और आर्ट पार्टीज भी शुरू की हैं। उनकी योजना रेसिन आर्ट को और बड़े स्तर पर ले जाने और हर आयु वर्ग के लोगों को इससे जोड़ने की है, जिससे यह कला और अधिक प्रचलित हो सके।

Heading Title

चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।

बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।

Leave a Comment

चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।