नई दिल्ली। भोपाल की कई महिलाएं अपने हुनर और मेहनत से उद्यमिता, मॉडलिंग और इन्फ्लुएंसिंग के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रही हैं। जहान्वी शर्मा, संध्या आर्य, पल्लवी अग्रवाल, स्मिता सेठी और प्रेरणा आदित्य जालोरी जैसी महिलाएं अपनी कहानियों से अन्य महिलाओं को प्रेरित कर रही हैं। ये सभी अलग-अलग क्षेत्रों में न केवल खुद को स्थापित कर रही हैं, बल्कि समाज में महिला सशक्तिकरण की एक मिसाल भी पेश कर रही हैं।
अपने संघर्षों और सफलता की कहानियों के माध्यम से ये महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि अगर दृढ़ संकल्प और मेहनत हो, तो कोई भी लक्ष्य दूर नहीं। महिला उद्यमिता से लेकर डिजिटल इन्फ्लुएंसिंग तक, ये सभी महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रही हैं।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की जहान्वी शर्मा, प्रिंसिपल ‘द फर्स्ट स्टेप स्कूल’, ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। शिक्षकों के परिवार से आने वाली जहान्वी ने अपनी शुरुआती शिक्षा भारत में पूरी करने के बाद लंदन से एमबीए किया। वहाँ रहते हुए उन्होंने खुद को एक मजबूत लीडर के रूप में स्थापित किया और कोस्टा में मैनेजर पद तक पहुँचीं। शादी के बाद भारत लौटने पर उन्होंने अपने अनुभवों का उपयोग करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने का निर्णय लिया।
जहान्वी शर्मा ने 2013 में केवल चार बच्चों के साथ अपने स्कूल की नींव रखी। शुरुआती वर्षों में कठिनाइयों के बावजूद, उनके समर्पण और शिक्षा के प्रति जुनून ने स्कूल को सफल बनाया। आज, उनके दो स्कूल हैं और तीसरे की स्थापना की योजना अंतिम चरण में है। उनके संस्थान में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी अवसर दिए जाते हैं। उन्होंने स्कूल में काम करने वाली महिलाओं को साक्षर बनाने की मुहिम भी चलाई, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।
जहान्वी का मानना है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली को और अधिक व्यावहारिक और बच्चे-केंद्रित बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने अपने स्कूल में इंटरैक्टिव लर्निंग और व्यक्तिगत कौशल विकास पर जोर दिया है। वह कहती हैं कि शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह बच्चों को रचनात्मक और आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम होनी चाहिए। उनकी इस सोच और प्रयासों ने उन्हें शिक्षा जगत में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व बना दिया है।

मध्यप्रदेश के भोपाल की ही संध्या आर्य, जो एसएस करियर्स की प्रोपराइटर हैं, ने अपने बिजनेस सफर की शुरुआत 2010 में की थी। उन्होंने स्किल डेवलपमेंट और आईटीआई संस्थानों से करियर की शुरुआत की, लेकिन कोविड-19 के कारण उन्हें अपने आईटीआई बंद करने पड़े। इसके बाद, 2018 में पेट्रोलियम सेक्टर में अवसर तलाशते हुए उन्होंने बल्क एलपीजी परिवहन के लिए टैंकर खरीदने की चुनौती स्वीकार की। सरकारी नीतियों में बदलाव के लिए उन्होंने डिक्की संस्था से सहयोग लिया और अंततः दो टैंकर खरीदकर इस व्यवसाय में कदम रखा। उनके परिवार का पहले से ही पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी का व्यवसाय था, जिससे उन्हें इस क्षेत्र की बुनियादी जानकारी थी।
व्यवसाय को आगे बढ़ाने के दौरान संध्या आर्य को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, खासकर बड़े ट्रांसपोर्टेशन बिजनेस में महिला होने के नाते। ड्राइवरों से संवाद, टैंकरों का रखरखाव, डीजल-पेट्रोल प्रबंधन और बैंक लोन चुकाने जैसी कठिनाइयों को उन्होंने अपनी मेहनत और समझदारी से पार किया। हर महीने 1,13,000 रुपये की ईएमआई भरना एक चुनौती थी, लेकिन सही योजना और परिवार के सहयोग से उन्होंने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया। उनके टैंकर अब भोपाल, इंदौर, गुजरात, जामनगर और हैदराबाद जैसे शहरों में सक्रिय हैं।
संध्या आर्य का लक्ष्य अपने व्यवसाय को और विस्तार देना है। वे चाहती हैं कि उनके पास और अधिक टैंकर हों और वे बड़ी कंपनियों के टेंडर में भाग लें। उन्होंने अपने अनुभवों से न केवल खुद को सशक्त बनाया, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनीं। वे मानती हैं कि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए आत्मविश्वास, सीखने की ललक और समाज व परिवार का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है।

भोपाल की ही लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर और फैशन मॉडल पल्लवी अग्रवाल ने अपने सफर के बारे में बात करते हुए बताया कि वह मूल रूप से माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं, लेकिन 2019 में एक ब्यूटी पेजेंट जीतने के बाद उनकी रुचि फैशन इंडस्ट्री में बढ़ी। मिसेज कर्वी क्वीन 2019 का खिताब जीतने के बाद उन्होंने मॉडलिंग और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग को करियर के रूप में अपनाया। अपने पैशन को प्रोफेशन में बदलते हुए उन्होंने कई ब्रांड्स के साथ काम किया और स्वतंत्र रूप से खुद को इस क्षेत्र में स्थापित किया।
पल्लवी का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में सफलता पाने के लिए संघर्ष और रचनात्मकता बेहद जरूरी होती है। मॉडलिंग इंडस्ट्री में कड़ा मुकाबला होने के कारण उन्होंने खुद को केवल फैशन मॉडल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एक लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। वह इंस्टाग्राम के माध्यम से विभिन्न ब्रांड्स जैसे मिंत्रा और अमेज़न के साथ कोलैबोरेशन कर मध्य प्रदेश में उनके उत्पादों का प्रचार करती हैं। उनके अनुसार, कंटेंट क्रिएशन में निरंतर नया और रचनात्मक सोचने की जरूरत होती है, जिससे वह अपने दर्शकों से जुड़ सकें।
अपने करियर को लेकर पल्लवी बेहद उत्साहित हैं और आने वाले वर्षों में खुद को एक सफल रनवे मॉडल के रूप में देखना चाहती हैं। वह लक्मे और अन्य बड़े ब्रांड्स के लिए काम करने का सपना रखती हैं। उनका मानना है कि इस फील्ड में आत्मनिर्भरता और निरंतर नई चीजें सीखने की चाह ही इंसान को आगे बढ़ाती है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग एक होम-आधारित काम हो सकता है, लेकिन इसमें मेहनत, क्रिएटिविटी और डेडिकेशन की जरूरत होती है। उनका लक्ष्य अपनी कला और स्टाइल से फैशन इंडस्ट्री में अपनी मजबूत पहचान बनाना है।

महाराष्ट्र के अकोला की स्मिता सेठी फैशन स्टोर की फाउंडर ने अपने सपने को साकार करने के लिए कठिनाइयों का डटकर सामना किया। उनके पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने छोटी उम्र से ही सिलाई-कढ़ाई में रुचि दिखाई और अपने पापा के अधूरे सपने को पूरा करने का निश्चय किया। उस समय फैशन इंडस्ट्री को बहुत बड़ा क्षेत्र नहीं माना जाता था, लेकिन उन्होंने इसे अपनाने का साहस दिखाया। पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद, उन्होंने नागपुर के एक संस्थान से फैशन डिज़ाइनिंग की शिक्षा ली और अपने हुनर को निखारा।
शादी के बाद जीवन में कुछ रुकावटें आईं, लेकिन परिवार के कुछ सदस्यों, खासकर उनकी सास और बहनों के सहयोग से उन्होंने अपने करियर को फिर से शुरू किया। हालांकि, उनके पति ने शुरू में उनके काम का समर्थन नहीं किया, लेकिन बाद में परिवार के समझाने पर उन्होंने भी साथ दिया। धीरे-धीरे स्मिता ने एक छोटे स्तर पर अपना बुटीक शुरू किया, जहाँ वह खुद ही डिज़ाइन तैयार करती थीं। आज उनके पास चार पुरुष और दो महिला कर्मचारी हैं, जो उनके बुटीक के संचालन में सहयोग कर रहे हैं। उनका बुटीक अब केवल अकोला तक सीमित नहीं है, बल्कि पुणे और नागपुर जैसे शहरों से भी ग्राहक उनकी सेवाएं लेने आते हैं।
भविष्य में, स्मिता सेठी का सपना है कि वह अपने पिता की तरह एक बड़ा और प्रतिष्ठित बुटीक स्थापित करें, जहाँ वह खुद अपने ब्रांड को आगे बढ़ा सकें। उन्होंने अपने संघर्षों से सीखा है कि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास से कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है। आज वह अपने काम से न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, बल्कि अपने कर्मचारियों और परिवार के लिए भी प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं।

भोपाल की रहने वाली मॉम इन्फ्लुएंसर प्रेरणा आदित्य जालोरी ने बताया कि उनका कंटेंट क्रिएशन का सफर एक योजनाबद्ध तरीके से शुरू नहीं हुआ था। जब उन्होंने अपनी बेटी दिविता को जन्म दिया, तो बस उसकी यादों को सहेजने के लिए इंस्टाग्राम पर तस्वीरें पोस्ट करने लगीं। धीरे-धीरे लोगों का प्यार और सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने लगी, जिससे उनका सफर आगे बढ़ता गया। बिना किसी पूर्व योजना के शुरू किया गया यह सफर अब ब्रांड कोलैबोरेशन और डिजिटल प्रभाव के माध्यम से उन्हें एक नई पहचान दिला चुका है।
प्रेरणा ने बताया कि उनका यह सफर आसान नहीं था। इसमें उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने निरंतर मेहनत जारी रखी। कंटेंट क्रिएशन के क्षेत्र में सफल होने के लिए उन्होंने खुद को ट्रेंड्स के अनुसार अपडेट रखना सीखा। उन्होंने यूट्यूब ब्लॉगिंग भी शुरू की, जिससे उनके फॉलोअर्स को और अधिक जुड़ाव महसूस हुआ। ब्रांड्स के साथ कोलैबोरेशन में भी उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी मेहनत और दृढ़ संकल्प ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।
उन्होंने नए कंटेंट क्रिएटर्स को सलाह दी कि इस क्षेत्र में धैर्य और निरंतरता बेहद जरूरी है। वायरल कंटेंट की उम्मीद से ज्यादा, नियमित रूप से अच्छा काम करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि 0-3 साल के बच्चों से जुड़े ब्रांड कोलैबोरेशन लगभग पूरे कर चुकी हैं और अब उनकी यात्रा नए क्षेत्रों की ओर बढ़ रही है। अपनी बेटी को किसी तरह की जबरदस्ती नहीं करने का संकल्प लेते हुए, उन्होंने कहा कि वह सिर्फ उसका मार्गदर्शन करेंगी और उसे अपनी रुचि के अनुसार बढ़ने देंगी।
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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी
जब पेरेंट्स अपने बच्चों को प्राइमरी स्कूल भेजते हैं, तो उनकी प्राथमिक अपेक्षा होती है कि बच्चों को मजेदार तरीके से सीखने का अवसर मिले। छोटे बच्चों का दिमाग पहले आनंद लेना चाहता है। अगर उन्हें मजा नहीं आएगा, तो वे आगे नहीं बढ़ेंगे। हर बच्चे के अंदर प्रतिभा होती है, जरूरी है हम उसे समझें।
बच्चों के स्कूल जाने से पहले पेरेंट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। यह समझना ज़रूरी है कि आपके बच्चे को क्या चाहिए, और उसी के आधार पर स्कूल का चयन करें। ऐसा स्कूल चुनें जिसमें खुला क्षेत्र हो और स्टाफ बच्चों की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो। स्कूल और उसकी फैकल्टी बच्चों को संतुष्ट करने में भी सक्षम होना चाहिए।




