db News Network

Home » भोपाल के युवा उद्यमी सिद्धार्थ पाल AI के दम पर बदल रहे बिज़नेस का तरीका

भोपाल के युवा उद्यमी सिद्धार्थ पाल AI के दम पर बदल रहे बिज़नेस का तरीका

0 comments 37 views 2 minutes read

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से उभरते टेक उद्यमी और यूनोफिन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर एवं सीईओ सिद्धार्थ पाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए व्यवसायों की कार्यप्रणाली को नई दिशा दे रहे हैं। कई असफलताओं के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और आज AI आधारित समाधान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।

इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिद्धार्थ पाल ने नौकरी के बजाय स्टार्टअप की राह चुनी। शुरुआती दौर में उन्हें कई बार असफलता और धोखे का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने सीखना नहीं छोड़ा। ई-कॉमर्स से अपने करियर की शुरुआत करने के बाद उन्होंने टेक्नोलॉजी के बदलते स्वरूप को समझा और अपने बिज़नेस को स्केल करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर रुख किया। विभिन्न वर्कशॉप्स और प्रोग्राम्स के माध्यम से AI की गहरी समझ विकसित कर उन्होंने अपने व्यवसाय में ऑटोमेशन और डेटा आधारित निर्णय प्रणाली लागू करनी शुरू की।

सिद्धार्थ की कंपनी यूनोफिन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड, जो हाल ही में स्थापित हुई है, अब केवल आईटी तक सीमित नहीं बल्कि विभिन्न इंडस्ट्रीज़ को लॉजिकल और ऑटोमेशन आधारित कंसल्टेंसी दे रही है। उनका कहना है कि AI के ज़रिए कंपनियां मानव निर्भरता वाले कई रूल-बेस्ड टास्क ऑटोमेट कर सकती हैं, जिससे प्रोडक्टिविटी और निर्णय लेने की गति कई गुना बढ़ जाती है। उन्होंने अपने बिज़नेस में कस्टमर सपोर्ट को भी पूरी तरह ऑटो-पायलट मोड पर शिफ्ट कर दिया है, जहां हजारों ग्राहक एक साथ बिना देरी के सेवा प्राप्त कर सकते हैं।

हालांकि वे AI को शक्तिशाली लेकिन “अनकंट्रोल्ड ब्रेन” मानते हैं। उनका कहना है कि इसका उपयोग समाज निर्माण के लिए भी किया जा सकता है और गलत दिशा में भी। डीपफेक, डेटा ब्रीच और फर्जी कंटेंट जैसे दुरुपयोग को लेकर वे सतर्क रहने की सलाह देते हैं। सिद्धार्थ का मानना है कि जैसे कंप्यूटर आने पर जॉब रोल बदले थे, वैसे ही AI के दौर में भी नौकरियां खत्म नहीं होंगी बल्कि नए अवसर पैदा होंगे। उनका लक्ष्य टेक्नोलॉजी के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना और भारत को AI इनोवेशन के क्षेत्र में मजबूत बनाना है।

Leave a Comment

चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।