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असम सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने कांग्रेस नेता को लेकर कह दी ये बड़ी बात

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नई दिल्ली। असम के सीएम हिमंत बिस्व सरमा ने दावा किया है कि राहुल गांधी एक बेसब्र व्यक्ति हैं। सरमा ने ये बात राहुल गांधी की बीते दिनों असम से निकली न्याय यात्रा को लेकर कही। सीएम ने कहा कि राहुल गांधी ने बिना असम की राजनीति के बारे में जानकारी लिए बयानबाजी की। सरमा ने कहा कि असम कांग्रेस के नेताओं ने राहुल गांधी को जानकारी देने की कोशिश की होगी, लेकिन राहुल गांधी में सब्र नहीं है, जबकि किसी राज्य की संस्कृति, वहां के मुद्दों और भूगोल को समझने में काफी समय देना पड़ता है।

असम सीएम ने कहा कि राहुल गांधी की न्याय यात्रा के दौरान सड़कों पर काफी हंगामा हुआ। इससे कांग्रेस पार्टी के ही कई नेता नाराज हैं। सरमा ने दावा किया कि लोकसभा चुनाव के बाद बड़ी संख्या में असम कांग्रेस के नेता भाजपा में शामिल हो जाएंगे। सरमा ने कहा कि, ‘राहुल गांधी राज्य की संस्कृति के बारे में नहीं जानते हैं और वह इसके बारे में पढ़ते या सहयोगियों से चर्चा भी नहीं करते। वह बस आते हैं और लोगों को अपने बयानों से परेशान करते हैं। अगर आप किसी राज्य में जाते हैं, तो पहले हमें उस राज्य के सांस्कृतिक हस्तियों के बारे में जान लेना चाहिए। क्या बातें कहनी हैं और क्या नहीं और क्या मुद्दे राज्य के लिए संवेदनशील हैं, इसके बारे में भी जानकारी ले लेनी चाहिए।’ सरमा ने कहा कि ‘वह भी जब किसी अन्य राज्य में जाते हैं तो पहले वहां के बारे में जानकारी हासिल करते हैं ताकि कोई गलती न हो।

सरमा ने आरोप लगाया कि ‘राहुल गांधी बिना किसी पूर्व जानकारी के आते हैं और जानबूझकर या अनजाने स्थानीय लोगों को शर्मसार करके जाते हैं।’ उदाहरण देते हुए हिमंत बिस्व सरमा ने कहा कि ‘राहुल गांधी ने न्याय यात्रा के दौरान राज्य में जातीय जनगणना और मणिपुर हिंसा के मामले उठाए, लेकिन असम में इन दोनों मामलों में लोगों की रुचि नहीं है। असम जातीय आधार पर एक मुक्त राज्य है, जहां जातीय व्यवस्था पर लोगों का विश्वास नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार में ये मुद्दा काफी अहम है, लेकिन असम में नहीं।’ असम सीएम ने कहा कि ‘जब आप असम में मणिपुर के बारे में बात करते हैं तो लोग इससे जुड़ाव महसूस नहीं करते क्योंकि असम और मणिपुर दो अलग राज्य हैं। मणिपुर का असम में और असम में मणिपुर का कोई प्रभाव नहीं है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।