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जनाधार मोर्चे पर भूपेश बघेल की दूसरी अग्निपरीक्षा!

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रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनांदगांव लोकसभा सीट पर इस बार रोचक मुकाबला होने वाला है। इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस नेता भूपेश बघेल स्वयं चुनावी मैदान में हैं। जबकि भाजपा की ओर से मौजूदा सांसद संतोष पांडेय दोबारा जोर आजमाइश कर रहे हैं। भूपेश विधानसभा चुनाव में पाटन विधानसभा सीट से अपनी विधायकी बचाने में तो कामयाब रहे हैं पर अपनी सरकार नहीं बचा पाए हैं।

अब एक बार फिर उनकी साख दांव पर लगी हुई है। कांग्रेस ने भूपेश को मैदान में इसलिए उतारा है कि प्रदेश में कांग्रेस की सीट का ग्राफ बढ़ाया जा सके। यह सीट भाजपा के लिए भी अहम है क्योंकि भाजपा नेता व छत्तीसगढ़ में तीन बार मुख्यमंत्री रहे डा. रमन सिंह भी इसी क्षेत्र से विधायक हैं। हालांकि रमन वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष होने के नाते सक्रिय राजनीति में प्रत्यक्ष सहभागी नहीं बन रहे हैं मगर उनकी भी साख लगी हुई है।

1999 से अब तक केवल एक उप चुनाव जीती कांग्रेस
राजनांदगांव की राह कांग्रेस के लिए अधिक मुश्किल रहने वाली है क्योंकि 1999 से अब तक हुए चुनावों में एक उप चुनाव के अलावा कांग्रेस अन्य चुनाव नहीं जीत पाई है। 1999 के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह चुनाव जीते थे। इसके बाद 2004 में भी भाजपा के प्रदीप गांधी चुनाव जीते थे, हालांकि 2007 के उप चुनाव में कांग्रेस के देवव्रत सिंह ने भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने में सफलता हासिल की थी। इसके बाद 2009 में भाजपा के मधुसूदन यादव, 2014 में भाजपा के अभिषेक सिंह और 2019 में भाजपा के संतोष पांडेय सांसद निर्वाचित हुए थे।

प्रदेश में राजनांदगांव की पहचान संस्कारधानी के रूप में है। गणेशोत्सव और हाकी के कई नामी खिलाड़ी देने वाले इस शहर में पहले बंगाल-नागपुर काटन मिल्स के रूप में राज्य का इकलौता सूती वस्त्र उद्योग था। एशिया का पहला और एकमात्र संगीत विश्वविद्यालय इंदिरा कला एवं संगीत विवि के नाम से खैरागढ़ की पूरी दुनिया में विशेष पहचान है। अविभाजित मध्य प्रदेश के समय मुख्यमंत्री और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे मोतीलाल वोरा भी इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं। स्वतंत्रता संग्राम में राजनांदगांव जिले के सेनानियों का बड़ा योगदान रहा है। जिले के छुईखदान को बलिदानी नगरी भी पुकारा जाता है।

शिवनाथ नदी के तट पर स्थित राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र को अगर विधानसभा के नजरिए से देखें तो यहां कुल आठ विधानसभा क्षेत्र (सामान्य-6, अजजा-1, अजा-1) में पांच सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं। इनमें खैरागढ़, डोंगरगांव, खुज्जी, डोंगरगढ़, मोहला-मानपुर शामिल हैं जबकि केवल तीन सीटों में पंडरिया, कवर्धा और राजनांदगांव में भाजपा के विधायक हैं। यानी कांग्रेस के विधायकों की संख्या अधिक है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।