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ग्वालियर के भूगोल शिक्षक सूर्या सिंह चौहान — अनुशासन, समर्पण और शिक्षा के माध्यम से देशसेवा की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं

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मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर से आने वाले पीजीटी जियोग्राफी शिक्षक सूर्या सिंह चौहान ने बताया कि उनके शिक्षक बनने की प्रेरणा एक साधारण कॉलेज क्लास से मिली, जो आगे चलकर जीवन का सबसे बड़ा turning point बन गया। ग्रैजुएशन के दौरान, एक दिन उनके प्रोफेसर ने क्लास में अचानक कहा कि किसी एक विषय पर तुरंत प्रस्तुति दें। पूरी कक्षा में एकमात्र हाथ सूर्या सिंह का उठा। जब उन्होंने स्टेज पर पढ़ाया, तो सबने उनकी तारीफ की और वहीं से उन्हें एहसास हुआ कि पढ़ाना उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक जुनून है। प्रारंभिक दौर में उन्होंने प्राइवेट कोचिंग से शुरुआत की और आज वे एक प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल में अपने ज्ञान और अनुभव से भविष्य की पीढ़ी को दिशा दे रहे हैं।

सूर्या सिंह का मानना है कि शिक्षक का कार्य केवल किताबों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह एक मार्गदर्शक की तरह होता है जो विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने की राह दिखाता है। वे बताते हैं कि उन्होंने 2015 में शिक्षण की शुरुआत की और आज एक दशक बाद भी अपने छात्रों के साथ उनके उम्र के अंतर को एक सेतु की तरह उपयोग करते हैं — ताकि वे छात्रों की भावनाओं और संघर्षों को बेहतर समझ सकें। उनका कहना है, “जब मैं खुद छात्र था, तब जिन कठिनाइयों से गुज़रा, अब उन्हीं अनुभवों से मैं अपने विद्यार्थियों को दिशा देता हूँ ताकि वे वही गलतियाँ दोहराएँ नहीं।” वे यह भी मानते हैं कि 11वीं–12वीं के छात्र जीवन का वह चरण है जहाँ सही मार्गदर्शन और सकारात्मक सोच जीवन की दिशा तय करती है।

शिक्षा के बदलते स्वरूप पर बात करते हुए सूर्या सिंह कहते हैं कि तकनीक की भूमिका अहम है, लेकिन किताबें ही इंसान की सबसे बड़ी शिक्षक हैं। उनका विश्वास है कि ऑनलाइन माध्यम ज्ञान दिखा सकता है, पर समझ विकसित नहीं कर सकता। वे अपने छात्रों को हमेशा प्रेरित करते हैं कि वे किताबों को मित्र बनाएं, अनुशासन को जीवन का आधार बनाएं और निरंतरता को अपनी ताकत बनाएं। वे कहते हैं, “अगर आप अनुशासित हैं, तो सफलता आपसे दूर नहीं जा सकती। बच्चे तभी बेहतर इंसान बनेंगे जब वे आत्मनियंत्रण और ईमानदारी को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे।”
उनकी यह सोच सिर्फ एक शिक्षक की नहीं, बल्कि एक सच्चे राष्ट्रनिर्माता की झलक देती है, जो शिक्षा को देशसेवा का सबसे पवित्र माध्यम मानते हैं।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।