नई दिल्ली। संगम गोयल की हाल ही में लिखी गई कविता ने पाठकों के दिलों को गहराई से छू लिया है। “आओ नमन करें उस आसमान को” शीर्षक वाली इस कविता में, उन्होंने अपने पिता के प्रति अपनी अपार श्रद्धा और प्रेम को बेहद सुंदर और काव्यात्मक तरीके से व्यक्त किया है। कविता उनके पिता के मार्गदर्शन, शिक्षा और आदर्शों की महत्ता को उजागर करती है, और जीवन के मूल्यों, संघर्षों और कर्म की गहराइयों को बयान करती है।
पहली कविता
मैं तेरे आंगन की तुलसी हूँ। अगर जाना है, तो जाओ, बस एक बक्सा लेकर आई थी, और अब वही बक्सा लेकर जा सकती हूँ। “कोई नहीं, मैं कोई नहीं, मैं तो तेरे आंगन की तुलसी हूँ।” पहले रात में, उसी बक्से के सहारे मैंने अपना सब कुछ तुम्हें सौंप दिया। क्या अब इसे लौटा पाओगे?
इसी बक्से के साथ मैंने तुम्हारे घर को सजाया और संवारा। अपनी मेहनत और दिल लगाकर किया। क्या इस मेहनत की कोई कीमत लौटा पाओगे? धन नहीं था मेरे पास, लेकिन श्रम और मन की शक्ति दी। क्या तुम्हारे बच्चों के लिए लाई गई इस गर्भ की कीमत चुका पाओगे?
हर करवा चौथ पर सिंगार किया, और किसी ओर की तरफ ध्यान तक नहीं दिया। प्यारे, अगर मेरी नजरें भूल भी जाओगे, तो क्या मेरी खुशबू, जो इन दीवारों में समाई है, उसे मिटा पाओगे? जब कोई तुम्हारे लिए और मेरे लिए नहीं आएगा, तो उन बिताए हुए पलों को किस रूप में याद करोगे?
मेरी पढ़ाई, समझ, महक और सहनशीलता… वो लड़की, मां, औरत, बहू, सहेली, बाई, मैनेजर और तुम्हारे बच्चों की मां—अगर मैं सब कुछ समेटकर उस बक्से में ले जाऊं, तो सोचो कितने अकेले रह जाओगे। यही सोचकर कदमों को रोक लेती हूं। जाने दो, तुम्हारी मां ने भी यही सुना था, पगली।
पूरा हिंदुस्तान सदियों से यही सुन रहा है। लेकिन दिल जानता है कि हर पति कभी अपने प्यार में, कभी संसार के कामों में पागल होता है। तू क्यों इतनी चिंता करती है? अब तक सब किया है और आगे भी करते रहेंगे। इस कर्तव्य पथ पर धीर-वीर की कहानियां लिखी जाती हैं। तू भारत की नारी है, लेकिन शायद आज का आधुनिक युवा इसे कभी नहीं समझ पाएगा।
दूसरी कविता
जब उनके सामने पल्लू गिराती, इठलाती और हंसकर रिझाती औरत सिर चढ़ जाती है, तब वही बक्सा लेकर आने वाली औरत पसंद नहीं आती। जब चार दिन की छुट्टी की बात होती है, तो सब कुछ भूलकर बस एक प्याली चाय की मांग कर लेते हैं। “सॉरी” कहकर बात बदल दी जाती है, लेकिन यह बक्सा मेरे हर खजाने का अनोखा कुआं है, जो सब कुछ दे देता है।
इस बक्से में मां की शिक्षाएं हैं, पिता का सम्मान है, भाई का आदर है, भाभी का मान है, और मेरे बच्चों का गर्व। ससुराल में एक अच्छी बहू होने का मान मुझे है। यही बक्सा मैं अपनी बेटी को भी देना चाहूंगी, ताकि वह भी अपने कर्तव्यों को उसी तरह निभा सके जैसे मैंने निभाए हैं।
मैं “तुम्ही पूजा, तुम्ही देवता” की परंपरा सीखकर आई हूं, इसलिए कभी राधा बनकर तुमसे लड़ जाती हूं और नखरे भी दिखाती हूं, क्योंकि मुझे यकीन है कि तुम कृष्ण बनकर मुझे मना लोगे, बंसी की मधुर धुन बजा दोगे। चाहे रुक्मणि हो या मां गिरिजा, मैं ब्रज की नारी हूं—कभी नहीं हारने वाली, हमेशा अपने पिया की प्यारी।
मेरे बक्से में खजाना है—रामायण की शिक्षाओं का, अनुसूया की देवताओं पर विजय का, सीता और अहिल्या का, गंगा और सरयू का। जो इसे देखता है, उसकी शक्ति का अंदाजा लगाता है। यह बक्सा ही मेरा स्वाभिमान है।
मेरे प्यारे पिया, तुम ही मेरे जीवन का आधार हो। मैंने जो किया, उसे छोड़ दो। हमारा रिश्ता नेह का है, और तुमसे हिसाब-किताब लगाने की कोई जरूरत नहीं। यह प्यार हवा जैसा अहसास है, जो मुफ्त में मिल रहा है। वरना कोविड के समय इसकी असली कीमत क्या थी, यह तुम भी जानते हो।
तीसरी कविता
पी, जी, मैंने भी बहुत कुछ देखा है। तीसरा नेत्र तो शक्ति के पास होता है, लेकिन जब नजरें मिल जाती हैं और दिल खिल उठता है, तो उसी से सब कुछ पूरा हो जाता है। फिर बक्से में क्या है, यह क्यों याद आता है? चलो, मिलकर होली और दिवाली मनाते हैं। बक्से को छोड़ो, तुम्हारे साथ हंसते और खुश रहते हैं।
यह अठखेलियों का समय है, अब मैं बालिका वधू की विदाई के बाद तुम्हारे साथ हूं। मैं कहीं नहीं जाऊंगी, कभी नहीं जाऊंगी, चाहे तुम कितनी भी बार कह दो। इस बक्से की वजह से ही तुम्हारी सारी दौलत है, और मुझे समझ-समझकर कभी समझदार बन ही जाऊंगी।
“ढाई अक्षर प्रेम का,
पढ़े सो पंडित होय।”
मैं इस प्रेम की राह पर तुम्हारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलूंगी। हाथ तुम्हारा पकड़े रहना, क्योंकि मैं कमजोर हूं, और तुम जानते हो। तुम्हारे कदमों से लिपटकर, बेल की तरह, दिल तक का सफर तय करूंगी।
अब कभी मत कहना, “जाओ, जहां जाना है।” मेरा जीना और मरना यहीं है। इसके सिवा कहीं और जाना नहीं। पिया, यह घर तुम्हारा है, और मैं तुम्हारे आंगन की तुलसी हूं!
चौथी कविता
आओ नमन करें उस आसमान को, जिसके साए में हमारी हर अच्छाई ने आकार लिया। उनके विचार जग से अलग थे, जिन्होंने हमारी भलाई के लिए अपनी रातें जागते हुए बिताईं। हमारे पिता ही हमारे गुरु थे, जिन्होंने शिक्षा के महत्व को समझाते हुए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने हमें सिखाया कि व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण उसका व्यक्तित्व होता है।
खुले दिल और आंखों से सपने देखो, कभी भी हिम्मत मत हारो। जीवन एक निरंतर यात्रा है, जिसमें सच्चाई और अच्छाई तुम्हारे मार्गदर्शक हैं। बिना रुके और थके आगे बढ़ते रहो, जब तक जीवन है। क्षमा करना और भूल जाना सीखो, खुद से कभी हार मत मानो। देवता तुम्हारे साथ खड़े हैं, बस तुम्हें हिम्मत से लड़ना है।
सेवा, सिमरन और पूजा से भी बड़ा है कर्म; कर्म ही सच्ची पूजा है, यही उनका विश्वास था। मैं सदा ईश्वर से यही मांगता हूं कि हर जन्म में मुझे ऐसे पिता मिलें और संस्कारों का उपहार मिलता रहे। आओ, हम नमन करें उस आसमान को।





