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हिंदी विश्वविद्यालय के इलेक्ट्रो होम्योपैथी कोर्स को कांग्रेस ने यह अवैध

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भोपाल। मप्र कांग्रेस विचार विभाग के अध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता ने अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित इलेक्ट्रो होम्योपैथी कोर्सेज को अवैध और जानलेवा बताते हुए इन पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की है। गुप्ता ने कहा कि इन कोर्सों की न तो कोई वैधानिक मान्यता है और न ही इन्हें संचालित करने के लिए किसी प्रकार की कौंसिल या नियामक संस्था गठित की गई है, फिर भी इनके डिग्रीधारी ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में फर्जी डॉक्टर बनकर निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं, जिससे निर्दोष लोगों की जान जा रही है।

भूपेंद्र गुप्ता ने महामहिम राज्यपाल को पत्र लिखकर कहा है कि चूंकि वे राज्य के कुलाधिपति हैं, अतः उन्हें तत्काल इन कोर्सों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए ताकि और लोगों की जान खतरे में न पड़े। उन्होंने मांग की है कि विश्वविद्यालय के कुलगुरु, कुलसचिव, अध्ययन केंद्र प्रभारी और निरीक्षक की पांच वर्षों की संपत्ति की जांच CBI, लोकायुक्त या EOW से कराई जाए। गुप्ता ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए, तो कांग्रेस इस मामले को जनहित याचिका के रूप में अदालत में ले जाएगी। सरकार का मौन रहना आपराधिक उदासीनता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला ‘सीरप कांड’ जैसी त्रासदी बन सकता है।

भूपेंद्र गुप्ता ने बताया कि इंदौर और खंडवा जैसे जिलों में इलेक्ट्रो होम्योपैथी उपचार से मरीजों की मौत के कई मामले सामने आए हैं, परंतु सरकार अब तक निष्क्रिय बनी हुई है। उन्होंने कहा,मैंने 26 मार्च 2025 को ही सरकार और महामहिम राज्यपाल को इन कोर्सों की वैधानिकता को लेकर आगाह किया था, लेकिन छह महीने बीत जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। सरकार स्वयं विधानसभा में यह स्वीकार कर चुकी है कि ये कोर्स मान्यता प्राप्त नहीं हैं और इनसे जुड़े किसी कौंसिल या अधिनियम का अस्तित्व नहीं है। गुप्ता के अनुसार, इन कोर्सों से निकलने वाले विद्यार्थियों की मूल योग्यता सिर्फ 10वीं या 12वीं पास है, लेकिन वे डॉक्टर बनकर निजी क्लीनिक चला रहे हैं। कई आदिवासी और गरीब मरीज इन झोलाछाप डॉक्टरों के झांसे में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं।

कांग्रेस नेता ने अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जब विश्वविद्यालय से आरटीआई के माध्यम से इन कोर्सों की फैकल्टी, अध्ययन केंद्रों और निरीक्षण रिपोर्ट की जानकारी मांगी गई, तो विश्वविद्यालय ने जानकारी देने से इनकार कर दिया। पहले इन्हीं विषयों पर विश्वविद्यालय ने आरटीआई में जानकारी दी थी, अब इंकार कर रहा है। इससे साफ है कि वह झोलाछाप डॉक्टरों को बचाने में संलिप्त है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारी अध्ययन केंद्रों की अलॉटमेंट प्रक्रिया में भारी रकम वसूल रहे हैं और इस भ्रष्टाचार की आड़ में इन फर्जी डिग्रीधारियों को खुली छूट दे रखी है।

गुप्ता ने बताया कि खंडवा जिले के एक ब्लॉक में ऐसे ही इलेक्ट्रो होम्योपैथ डॉक्टर के इलाज से दो बच्चों की मृत्यु हुई थी, जिसके बाद सीएमएचओ ने क्लीनिक सील कर दिए। लेकिन जब आरटीआई में क्लीनिक संचालकों की डिग्रियों की जानकारी मांगी गई, तो निजता का हवाला देकर जानकारी देने से इनकार कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी इस आपराधिक लापरवाही पर पर्दा डाल रहे हैं।

कांग्रेस नेता ने कहा कि फर्जी डिग्री देकर डॉक्टर बनाना एक गंभीर अपराध है, और इस पूरे प्रकरण में विश्वविद्यालय प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और सरकार तीनों की नैतिक व कानूनी जिम्मेदारी बनती है। उन्होंने कहा कि पार्टी गरीब, ग्रामीण और आदिवासी समाज को इन “नकली चिकित्सकों के चंगुल से बचाने के लिए हर स्तर पर संघर्ष करेगी।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।