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यात्रा ही मेरी डेस्टिनी है — भोपाल के उद्यमी अभिषेक कुमार झवर युवाओं को सिखा रहे हैं फाइनेंशियल फ्रीडम का मंत्र

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मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एंटरप्रेन्योर और स्टोरी टेलर अभिषेक कुमार झवर ने अपनी उद्यमिता की शुरुआत इंजीनियरिंग के दिनों से की। सफल उद्यमियों की जीवनी पढ़ते-पढ़ते उनके भीतर भी व्यवसाय और नेतृत्व का बीज अंकुरित हुआ। आज वे न केवल एक फाइनेंशियल एडवाइज़र और पर्सनल फाइनेंस प्रैक्टिशनर हैं, बल्कि कहानियों के माध्यम से लोगों को निवेश, करियर और जीवन की दिशा समझाने का अनोखा कार्य भी कर रहे हैं।

अभिषेक झवर बताते हैं कि इंजीनियरिंग पूरी होने के बाद उनके पास दो नौकरियों के अवसर थे, लेकिन उन्होंने जोखिम लेते हुए अपना खुद का विचार चुना। शुरुआत में उन्होंने युवाओं को पब्लिक स्पीकिंग, कम्युनिकेशन और इंटरव्यू स्किल्स सिखाईं। धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि जैसे करियर की यात्रा में एक मेंटर की जरूरत होती है, वैसे ही वित्तीय यात्रा में भी हैंडहोल्डिंग आवश्यक है। उनका मानना है कि अधिकांश लोग निवेश और पैसे के प्रबंधन को जीवन के अंतिम पड़ाव तक समझ पाते हैं, जबकि सही मार्गदर्शन मिलने पर यह सफर आसान और तेज़ हो सकता है।

वर्तमान बाजार परिस्थिति पर बात करते हुए अभिषेक झवर कहते हैं कि निवेश कभी भी पूरी तरह “सुरक्षित और आसान” नहीं होता। बाजार में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है—जैसे मौसम बदलते रहते हैं। वे बताते हैं कि दीर्घकालिक निवेश ही असली संपत्ति निर्माण का आधार है। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि 6% रिटर्न पर निवेश दोगुना होने में 12 वर्ष ले सकता है, जबकि 12% रिटर्न पर यह समय आधा हो सकता है। हालांकि, हर निवेशक की स्थिति और लक्ष्य अलग होते हैं—जिसके पास पहले से बड़ी पूंजी है, उसके लिए कम जोखिम पर्याप्त हो सकता है, लेकिन जो शुरुआत कर रहा है उसे नियंत्रित जोखिम लेने की जरूरत पड़ती है।

रिटायरमेंट की उनकी परिभाषा पारंपरिक सोच से अलग है। उनके अनुसार रिटायरमेंट का अर्थ 60 वर्ष की आयु नहीं, बल्कि “फाइनेंशियल फ्रीडम” है—जहाँ व्यक्ति मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से काम करे। वे कहते हैं कि काम जीवन भर करना चाहिए, लेकिन केवल पैसे के लिए नहीं, बल्कि समाज और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए। एक स्टोरी टेलर के रूप में अभिषेक मानते हैं कि कहानियाँ लोगों को गहराई से जोड़ती हैं। जब निवेशक अपनी ही तरह के किरदार को किसी कहानी में देखता है, तो वह निर्णय लेने के लिए प्रेरित होता है। आने वाले वर्षों में वे खुद को ऐसे उद्यमी के रूप में देखते हैं जो समाज के लिए एक “एसेट” बने और लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।