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यादों को हमेशा के लिए संजो रहा ‘गुलकारी’: भोपाल की तान्या नायक ने फूलों को बनाया भावनाओं का अनमोल स्मृति चिन्ह

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भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की चार्टर्ड अकाउंटेंट और “गुलकारी” की संस्थापक तान्या नायक ने एक अनोखे स्टार्टअप के जरिए भावनाओं को सहेजने की नई पहल की है। उन्होंने ऐसे प्रोडक्ट्स विकसित किए हैं, जिनमें शादी की वरमाला, सालगिरह, जन्मदिन या किसी खास मौके पर मिले फूलों को वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उनका उद्देश्य केवल हैंडमेड गिफ्ट तैयार करना नहीं, बल्कि लोगों की अनमोल यादों को हमेशा के लिए जीवंत बनाए रखना है।

तान्या नायक ने बताया कि वर्ष 2022 में उन्हें यह विचार तब आया, जब उन्होंने महसूस किया कि किसी खास अवसर से जुड़े फूल कुछ दिनों बाद मुरझाकर फेंक दिए जाते हैं और उनसे जुड़ी भावनाएं भी समय के साथ धुंधली हो जाती हैं। इसी समस्या का समाधान खोजते हुए उन्होंने “गुलकारी” की शुरुआत की। चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई के साथ-साथ बचपन से आर्ट एंड क्राफ्ट में रुचि रखने वाली तान्या ने प्रोफेशनल वर्कशॉप्स के माध्यम से इस कला को निखारा और धीरे-धीरे इसे एक सफल व्यवसाय में बदल दिया। आज वे शादी की वरमाला, पहली मुलाकात में मिले गुलदस्ते, वर्षगांठ और अन्य विशेष अवसरों के फूलों को आकर्षक फ्रेम, स्मृति चिन्ह और सजावटी उत्पादों के रूप में संरक्षित कर रही हैं।

तान्या ने बताया कि अब तक उन्हें देशभर से 7,000 से अधिक ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं। हालांकि इस सफर में मौसम, नमी, तापमान और तकनीकी चुनौतियों के कारण कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा, लेकिन हर चुनौती ने उन्हें और बेहतर बनने का अवसर दिया। उनका मानना है कि मशीन से बने उत्पादों की तुलना में हस्तनिर्मित कलाकृतियों में भावनाएं, अपनापन और व्यक्तिगत स्पर्श होता है, जो उन्हें खास बनाता है। यही वजह है कि आज पैन इंडिया स्तर पर उनके काम को सराहना मिल रही है और लोग अपनी सबसे कीमती यादों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए गुलकारी पर भरोसा जता रहे हैं।

तान्या नायक ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता को दिया, जिन्होंने हर कदम पर उनका विश्वास बढ़ाया और नए प्रयोग करने की स्वतंत्रता दी। यहाँ बता दें, कि तान्या नायक की मां श्रीमती वर्षा नायक एक ग्रहणी हैं, तो वहीं उनके पिता श्री राकेश नायक जो कि सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर के पद पर एमपी इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत हैं। तान्या का सपना है कि आने वाले समय में “हैंडमेड गिफ्टिंग” की बात होते ही लोगों के मन में सबसे पहला नाम “गुलकारी” आए। साथ ही वे फ्लोरल आर्ट और इंटीरियर डेकोर के क्षेत्र में प्राकृतिक फूलों को संरक्षित करने की इस कला को नई पहचान दिलाकर भारत में एक नई सोच और नई संस्कृति विकसित करना चाहती हैं।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।