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सम्मानजनक समझौते के बिना उपचुनाव में नहीं उतरेगी कांग्रेस

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नई दिल्ली। यूपी में नौ सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव से कांग्रेस ने फिलहाल किनारा कर लिया है। समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के तहत कांग्रेस को गाजियाबाद और खैर की दो विधानसभा सीटें दी है, जबकि कांग्रेस अपने लिए पांच सीटों पर दावेदारी कर रही है। कांग्रेस गाजियाबाद और खैर की बजाय अपने लिए सीसामऊ, फूलपुर और मझवां सीटों पर दावेदारी कर रही है। इन सीटों पर समाजवादी पार्टी से बात न बनते देख कांग्रेस ने दबाव बढ़ा दिया है। पार्टी ने कहा है कि यदि उसे सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं तो वह चुनाव से दूर रहेगी।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, सबसे बड़ी पेंच गाजियाबाद और खैर विधानसभा सीटों को लेकर है। ये दोनों सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस लंबे समय से जीत दर्ज नहीं कर पाई है। यदि उपचुनाव में वह इन सीटों पर उतरती है तो भी उसके लिए जीत की संभावनाएं बहुत कम रहेंगी। जबकि यदि फूलपुर और मझवां सीटों पर वह उतरती है तो न केवल उसको जीत मिल सकती है, बल्कि इन क्षेत्रों में उसकी कमजोर होती पकड़ को भी मजबूती मिल सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस ने इन सीटों को लेकर अपना दबाव बढ़ा दिया है। वहीं, इन सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर चुके अखिलेश यादव के लिए पीछे हटना मुश्किल हो रहा है। यही कारण है कि दोनों दलों में पेंच फंस गया है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, यूपी अध्यक्ष अजय राय ने प्रदेश में पार्टी की स्थिति को देखते हुए अपनी ओर से मजबूत दावेदारी करने के अपने निर्णय से पार्टी आलाकमान को अवगत करा दिया है। अब सपा और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस पर अंतिम निर्णय लेगा। लेकिन ज्यादा संभावना इसी बात की है कि यदि सपा कांग्रेस को उसके मन मुताबिक सीटें नहीं देती है तो कांग्रेस उपचुनाव में नहीं उतरेगी। कांग्रेस नेताओं के अनुसार, सपा को सीटों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार करना पड़ेगा।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को किन कारणों से सफलता मिली थी, इसको लेकर अखिलेश यादव के मन में कुछ गलतफहमी है। उन्हें लगता है कि उन्होंने जो पीडीए समीकरण बनाया था, वह उनके पक्ष में गया है। जबकि कांग्रेस नेताओं के अनुसार, राहुल गांधी ने संविधान और आरक्षण को लेकर जो माहौल बनाया था, उसके कारण पिछड़े, दलित और मुसलमान कांग्रेस-सपा गठबंधन के साथ आए और उसे जीत मिली।

कांग्रेस नेताओं के अनुसार, लेकिन अखिलेश यादव इस कारण को स्वीकार नहीं करना चाहते। वे जीत का पूरा श्रेय अपने हिस्से में ले जाना चाहते हैं और कांग्रेस को उसकी उचित हिस्सेदारी नहीं देना चाहते। कांग्रेस नेताओं की चिंता है कि यदि इस उपचुनाव में ही वह दबाव में रह जाती है तो 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी सपा उसे इसी तरह बहुत कम सीटों पर निपटाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए वह समय रहते अपनी ताकत को आजमाना चाहती है और सपा से सम्मानजनक समझौता चाहती है जिससे आने वाले समय में भी उसकी स्थिति मजबूत रहे।

महाराष्ट्र में भी अखिलेश को कमजोर करना लक्ष्य
दरअसल, सपा अध्यक्ष यूपी के अलावा कुछ अन्य राज्यों में अपना पैर पसारकर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाना चाहते हैं। इसी कोशिश में वे हरियाणा भी गए थे, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। अब वे महाराष्ट्र में भी इसी जुगत में लगे हैं। लेकिन सपा के मैदान में आने से लगभग एक दर्जन सीटों पर मुसलमान वोटों में बंटवारा हो सकता है। इसका नुकसान इंडिया गठबंधन के दलों को होगा। माना जा रहा है कि यूपी में दबाव बढ़ाकर कांग्रेस नेतृत्व सपा को महाराष्ट्र में एक-दो सीटों पर समेटने का दांव भी आजमा रहा है, जो कम से कम एक दर्जन सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।