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थिएटर से ग्लैमर तक: गुजरात के भाविन सोनी ने एंकरिंग को बनाया दिलों की धड़कन

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नई दिल्ली। जामनगर जैसे छोटे शहर से निकलकर एंकरिंग की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले भाविन सोनी की कहानी संघर्ष, जुनून और आत्मविश्वास का प्रेरणादायक उदाहरण है। थिएटर आर्टिस्ट के रूप में सफर की शुरुआत करने वाले भाविन ने महसूस किया कि उनके पास ऐसा गिफ्ट है जिससे वे न सिर्फ स्टेज पर एक्ट कर सकते हैं, बल्कि उसे जी भी सकते हैं। एंकरिंग की शुरुआत ह्यूमर और एनर्जी से की, जहाँ स्क्रिप्ट से हटकर उन्होंने इंटरैक्शन-आधारित स्टाइल को अपनाया और दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान लाना अपनी प्राथमिकता बना ली।

स्ट्रगल से स्टाइल तक: कार में सोने से लेकर देशभर में छाने तक

भाविन ने बताया कि शुरुआत के दिनों में ट्रैवलिंग, इनकम और सामाजिक मान्यता सबसे बड़ी चुनौतियाँ थीं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट में देर रात तक ट्रैवेल करना, परिवार का दबाव और सीमित अवसर – इन सबसे जूझते हुए उन्होंने कभी हार नहीं मानी। धीरे-धीरे जब पहचान बनी, तो बर्थडे पार्टी से लेकर सेलेब्रिटी कॉन्सर्ट्स तक, हर तरह के इवेंट्स उन्होंने होस्ट किए। राजस्थान, गोवा, दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद सहित पूरे भारत में उन्होंने डेस्टिनेशन वेडिंग्स और कॉर्पोरेट इवेंट्स को अपने अंदाज़ में संभाला और ऑडियंस का दिल जीता।

गुजरात से ग्लोबल तक: एक दिल से लाखों दिलों की दूरी तय करने का सपना

आज भाविन सोनी न सिर्फ एक फ्रीलांस एंकर हैं, बल्कि उनकी अपनी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी भी है, जो वे गुजरात से संचालित करते हैं। वे कहते हैं, “मैं सिर्फ गुजरात तक नहीं, पूरी दुनिया में एक बेस्ट वेडिंग एंकर के तौर पर जाना चाहता हूँ।” अपनी टीम के साथ मिलकर वे हर इवेंट में परफेक्शन और इमोशन दोनों का संतुलन बनाए रखते हैं। उनका मानना है कि एक एंकर सिर्फ प्रोग्राम को नहीं चलाता, बल्कि लोगों की खुशियों का माध्यम बनता है। यही वजह है कि उनका लक्ष्य है – “एक दिल लेकर आया हूँ, पर लाखों दिलों में जगह बनाकर जाऊँगा।”

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।