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महिला दिवस: भोपाल की दिव्या इंद्रा चटर्जी शिक्षा और जागरूकता से महिलाओं को बना रहीं आत्मनिर्भर

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से चार्टर्ड अकाउंटेंट दिव्या इंद्रा चटर्जी महिलाओं के सशक्तिकरण और समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए लगातार काम कर रही हैं। कॉर्पोरेट क्षेत्र में लगभग सात वर्षों तक अकाउंट्स और फाइनेंस के क्षेत्र में कार्य करने के बाद उन्होंने शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में योगदान देने का फैसला किया। दिव्या का मानना है कि शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर और मजबूत बनाया जा सकता है।

भोपाल की दिव्या इंद्रा चटर्जी पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में करीब सात साल तक काम किया है। इसके बाद उन्होंने समाज के लिए कुछ सार्थक करने की सोच के साथ शिक्षा और डेवलपमेंट सेक्टर में कदम रखा। वे CPHD हेल्थकेयर फाउंडेशन की संस्थापकों में से एक हैं, जिसकी शुरुआत कोविड-19 महामारी के दौरान “कोविड पेशेंट हेल्प डेस्क” के रूप में हुई थी। इस पहल के जरिए जरूरतमंद मरीजों और उनके परिवारों तक जरूरी सहायता और जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया गया।

दिव्या सामाजिक कार्यों के साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वे दूरदर्शन में एंकर के रूप में काम कर चुकी हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति से जुड़े प्रयासों के तहत कॉमर्स और इकोनॉमिक्स विषयों की नई पाठ्यपुस्तकों के विकास में भी योगदान दे रही हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण को लेकर वे विशेष रूप से काम कर रही हैं और सेल्फ-डिफेंस ट्रेनिंग, मेंस्ट्रुअल हाइजीन जागरूकता और फाइनेंशियल लिटरेसी जैसे कार्यक्रमों से जुड़कर समाज में जागरूकता फैलाने का प्रयास कर रही हैं।
वर्ष 2022 में दिव्या को “मिस मध्यप्रदेश सेकंड रनर-अप” और “मिस मध्यप्रदेश टैलेंटेड” का खिताब भी मिला। पेजेंट के दौरान उन्होंने महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने के उद्देश्य से एक प्रेरणादायक कविता लिखकर मंच पर प्रस्तुत की, जिसके लिए उन्हें “मिस मध्यप्रदेश टैलेंटेड” का सम्मान मिला। दिव्या हिंदी कविता लेखन और मंच प्रस्तुति की भी शौकीन हैं और उनका मानना है कि हर महिला अपने आप में सुंदर और सक्षम है।

कविता:
“हाँ, वो खूबसूरत है”
वो जो दिल खोल के हंसना जानती है..
वो जो सिर्फ होठों से नहीं आंखों से मुस्कुराती है..
वो जो अकेले चलने में डरती नहीं, पर अपनों को साथ लेकर चलना चाहती है।
क्या जानती है कि वो कितनी खूबसूरत है?
उसे खौफ नहीं किसी चीज का, पर लोग कहते हैं डरा करो..
तुम कितनी ही निडर क्यों ना हो, पर बेटा, अंधेरे में मत चला करो..
उसकी खूबसूरती के पैमानों को तोड़ मरोड़ दिया..
वो सुंदर है या नहीं, इसका फैसला उसके पड़ोसियों ने किया..
वो तो आईने में खुद को देख मुस्कुराती थी,
“काला रंग अच्छा नहीं” यह ख्याल तो समाज ने ही उसे दिया..
वो हंस के टाल गई उन लोगों की बातों को,
पर अकेले में अब रोने लगी..
“शायद मैं खूबसूरत नहीं?”
आईने से धीरे से यह कहने लगी..
वो तूफान की तरह दौड़ने वाली लड़की,
सड़क के किनारे यूं ही सहमी सी चलने लगी..
घर की हंसती मुस्कुराती बेटी,
घर की रौनक जैसे बुझने लगी..
नजरें जमाने की बुरी थीं,
पर जिम्मेदार उसे ठहराया गया..
“समझौते तुम्हें ही करना है” कहकर
हर बार उसके सम्मान को घटाया गया..
बचपन में जब घुटनों से खून बहता था, छुपाती नहीं थी..
अब जब हर महीने खून बहाती है,
इस पर बात नहीं करना क्यों सिखाया गया?
वो रुकती गई, सिमटती गई..
वो जो घर की रानी बिटिया बन सकती थी,
“राजा बेटा” बनती गई..
काश उसे थोड़ा खुद के लिए भी जीना सिखाया होता,
काली, गोरी, पतली, मोटी… जैसी भी है वो खूबसूरत है,
काश किसी ने उसे यह भी बताया होता।
पापा कहते रहे “यह हमारी बेटी नहीं बेटा है”,
पर कोई यह भी बताए—
आखिर बेटी होने में कमी क्या है?
वो शांत है मगर एक तूफान है,
वो अकेली भी पूरी है—
दुनिया बस इसी बात से अनजान है।
हाँ, वो खूबसूरत है…
उसे खुद पर नाज़ करने दो।
उसे घर का बेटा बनाने की कोशिश मत करो,
घर की बेटी बने रहने दो।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

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