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घर की एक कुर्सी से शुरू हुआ सफर, आज महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं ‘डेबलीज़ फैमिली सलोन एंड एकेडमी’ की संस्थापक सुनीता सोनी

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भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में डेबलीज़ फैमिली सलोन एंड एकेडमी की संस्थापक सुनीता सोनी ने साबित किया है कि यदि परिवार का साथ, सीखने की लगन और आत्मविश्वास हो तो घर से शुरू हुआ छोटा प्रयास भी एक सफल उद्यम का रूप ले सकता है। एक कमरे और एक कुर्सी से शुरू हुई उनकी यात्रा आज सैकड़ों ग्राहकों का भरोसा जीतने के साथ-साथ अनेक महिलाओं को रोजगार और प्रशिक्षण देने का माध्यम बन चुकी है।

सुनीता सोनी ने बताया कि उन्हें उद्यमिता की राह पर आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा श्रेय उनके ससुर और परिवार को जाता है। शुरुआत में उन्होंने केवल शौक के तौर पर पर्सनल केयर का छोटा कोर्स किया, जिसके बाद प्रोफेशनल ट्रेनिंग लेकर भोपाल में अपने घर से एक छोटे से सलोन की शुरुआत की। ईमानदारी, बेहतर सेवाओं और ग्राहकों के विश्वास ने उनके काम को पहचान दिलाई। बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने डेबलीज़ फैमिली सलोन एंड एकेडमी की स्थापना की, ताकि जो ज्ञान और अनुभव उन्होंने वर्षों में अर्जित किया, वह अन्य महिलाओं और युवाओं तक भी पहुंच सके। परिवार के सहयोग और समय प्रबंधन को अपनी सफलता की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए उन्होंने कहा कि ग्राहकों की संतुष्टि ही उनके व्यवसाय की सबसे बड़ी पहचान बनी।

आज डेबलीज़ फैमिली सलोन एंड एकेडमी में हेयर, स्किन, मेकअप, कॉस्मेटोलॉजी, नेल आर्ट, टैटू आर्ट, लैश एक्सटेंशन, आईब्रो करेक्शन और विभिन्न ब्यूटी ट्रीटमेंट्स जैसी आधुनिक सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। साथ ही संस्थान में प्रोफेशनल प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिससे युवा अपना स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकें। सुनीता ने बताया कि उनकी एकेडमी स्किल इंडिया और विश्वकर्मा योजना से भी जुड़ी हुई है, जिसके माध्यम से विद्यार्थियों को प्रशिक्षण और आवश्यक संसाधनों का लाभ मिल रहा है। उनका मानना है कि ब्यूटी और वेलनेस इंडस्ट्री आज स्वरोजगार का बड़ा माध्यम बन चुकी है, जहां महिलाएं घर से भी अपना व्यवसाय शुरू कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकती हैं।

सुनीता सोनी ने कहा कि उनका उद्देश्य केवल व्यवसाय का विस्तार करना नहीं, बल्कि अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने कई जरूरतमंद महिलाओं को निशुल्क मेकअप और बेसिक कॉस्मेटोलॉजी का प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार की राह दिखाई है। भविष्य में वे स्लम और ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने की योजना बना रही हैं। उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि वे अपने सपनों को कभी दबने न दें, अपने अधिकारों और क्षमताओं पर विश्वास रखें तथा परिवार और समाज के सहयोग से आगे बढ़कर अपनी अलग पहचान बनाएं।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।