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गृहिणी से वेडिंग एंटरप्रेन्योर बनीं ज्योत्सना और रवीना, ‘शुभ मंगलम’ से ग्वालियर में बदल रहीं वैवाहिक आयोजन की तस्वीर

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मध्य प्रदेश के ग्वालियर की ज्योत्सना सिन्हा गंगवानी और रवीना कालरा गंगवानी ने पारंपरिक गृहिणी की भूमिका से आगे बढ़कर विवाह आयोजन क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। दोनों ने मिलकर ‘शुभ मंगलम’ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य शादी से जुड़े तमाम कार्यों को एक ही प्लेटफॉर्म पर व्यवस्थित करना है। महज एक वर्ष में उन्होंने कई विवाह समारोहों का सफल प्रबंधन कर यह साबित किया है कि सही सोच, परिवार का सहयोग और बेहतर समय प्रबंधन किसी भी महिला को आत्मनिर्भर बना सकता है।

ग्वालियर। ‘शुभ मंगलम’ की फाउंडर ज्योत्सना सिन्हा गंगवानी बताती हैं कि विवाह के बाद गृहिणी के रूप में जिम्मेदारियां निभाते हुए भी उनके मन में हमेशा उद्यमिता का सपना था। उन्होंने महसूस किया कि शादी समारोहों में परिवारों को मेहंदी आर्टिस्ट, मेकअप आर्टिस्ट, कोरियोग्राफर, पैकिंग विशेषज्ञ और अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग लोगों से संपर्क करना पड़ता है। इसी समस्या का समाधान निकालते हुए उन्होंने एक ऐसी सेवा शुरू करने का निर्णय लिया, जहां शादी से जुड़ी सभी जरूरतों का प्रबंधन एक ही जगह से हो सके। ‘शुभ मंगलम’ के माध्यम से वे लग्न पैकिंग, गिफ्ट पैकिंग, दूल्हा-दुल्हन की आवश्यकताओं, वेडिंग कंसल्टेंसी और विभिन्न प्रोफेशनल सेवाओं का समन्वय करती हैं।

महज एक वर्ष के भीतर ‘शुभ मंगलम’ ने 10 से अधिक शादियों में अपनी सेवाएं दी हैं। इस दौरान टीम ने सैकड़ों कस्टमाइज्ड हैम्पर्स तैयार किए, जिनमें ड्राई फ्रूट्स, मिठाइयां और विशेष उपहार शामिल थे। इसके अलावा दूल्हा और दुल्हन पक्ष की लग्न पैकिंग, चढ़ावे के वस्त्र, बर्तन और अन्य पारंपरिक सामग्री की आकर्षक पैकिंग भी की गई। सोशल मीडिया और बदलते ट्रेंड्स के प्रभाव से अब लोग केवल उपहार ही नहीं, बल्कि उनकी प्रस्तुति पर भी ध्यान देने लगे हैं। इसी मांग को देखते हुए ‘शुभ मंगलम’ ने ट्रांसपेरेंट गिफ्ट बॉक्स, रिटर्न गिफ्ट काउंटर और थीम आधारित पैकेजिंग जैसी नई सेवाएं भी शुरू की हैं।

शुभ मंगलम की को-ऑनर रवीना कालरा गंगवानी का मानना है कि किसी भी महिला के लिए परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होती है। हालांकि परिवार, विशेषकर जीवनसाथी के सहयोग और आपसी तालमेल से यह संभव हो जाता है। दोनों उद्यमी घर और व्यवसाय की जिम्मेदारियों को साथ लेकर चल रही हैं तथा ग्राहकों के घर जाकर पैकिंग सेवाएं प्रदान करती हैं ताकि पारंपरिक रीति-रिवाजों और परिवारों की भावनाओं का सम्मान बना रहे। उनका मानना है कि ग्वालियर में वेडिंग मैनेजमेंट और कस्टमाइज्ड पैकेजिंग का बाजार तेजी से विकसित हो रहा है और आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। ‘शुभ मंगलम’ का लक्ष्य भविष्य में अपनी सेवाओं का विस्तार कर विवाह आयोजन उद्योग में एक विश्वसनीय नाम बनना है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।