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क्लिनिक से आर्ट गैलरी तक: डॉ. सृष्टि भारती ने ‘मैं सरोवर’ के जरिए हैंडपेंटेड कला को दी नई पहचान

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मध्य प्रदेश के ग्वालियर की डॉ. सृष्टि भारती ने चिकित्सा क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के साथ-साथ कला के प्रति अपने जुनून को भी एक नई दिशा दी है। कोविड लॉकडाउन के दौरान एक शौक के रूप में शुरू हुई हैंडपेंटेड साड़ियों और आर्टिस्टिक क्राफ्ट की पहल आज ‘सरोवर’ के नाम से देश के कई शहरों तक पहुंच चुकी है। महज एक रचनात्मक प्रयोग से शुरू हुआ यह सफर अब स्थानीय कलाकारों को मंच देने और भारतीय हस्तकला को नए बाजारों तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।

पेशे से डेंटल सर्जन और दिल से कलाकार डॉ. सृष्टि भारती ने अपनी रचनात्मक सोच को एक अनोखे उद्यम में बदल दिया है। ‘मैं सरोवर’ नामक उनके आर्टिस्टिक ब्रांड की शुरुआत लॉकडाउन के दौरान हुई, जब बाजारों में गिफ्ट और हस्तनिर्मित वस्तुओं की उपलब्धता सीमित थी। ऐसे समय में उन्होंने अपने हाथों से तैयार किए गए पेंटेड रुमाल और उपहार अपने परिचितों को देने शुरू किए। इन कलाकृतियों को मिली सराहना ने उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके डिजाइनों ने जल्द ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया और यहीं से उनके उद्यम की व्यावसायिक यात्रा शुरू हुई।

डॉ. सृष्टि बताती हैं कि शुरुआत में उन्होंने इस कार्य को व्यवसाय के रूप में नहीं, बल्कि अपनी हॉबी के रूप में अपनाया था। हालांकि, समय के साथ उनके हैंडपेंटेड साड़ी, सूट और अन्य आर्टवर्क की मांग बढ़ने लगी। बेंगलुरु से मिले पहले ऑर्डर ने उनके आत्मविश्वास को नई उड़ान दी। बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के उन्होंने विभिन्न कपड़ों पर पेंटिंग की तकनीकों को प्रयोगों के माध्यम से सीखा। आज ‘सरोवर’ के उत्पाद ग्वालियर से निकलकर चंडीगढ़, नागपुर, बेंगलुरु समेत देश के कई शहरों और विदेशों तक पहुंच रहे हैं। उनके साथ कई स्थानीय और बाहरी कलाकार भी जुड़ चुके हैं, जिनकी कलाकृतियों को वे बाजार उपलब्ध कराने में मदद करती हैं।

मेडिकल प्रोफेशन और कला के बीच संतुलन बनाते हुए डॉ. सृष्टि ने साबित किया है कि जुनून और पेशा साथ-साथ चल सकते हैं। वर्तमान में वे अस्पताल प्रबंधन से जुड़े अपने कार्यों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि ‘मैं सरोवर’ की गतिविधियों को उनकी मम्मी और टीम के अन्य सदस्य संभालते हैं। भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे ‘मैं सरोवर’ को देश के विभिन्न शहरों तक विस्तार देना चाहती हैं और अधिक से अधिक कलाकारों को इससे जोड़ना चाहती हैं। उनका मानना है कि भारतीय हस्तकला और हैंडपेंटेड कला को यदि सही मंच मिले तो यह न केवल कलाकारों की पहचान बना सकती है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बन सकती है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।