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परंपरागत टेलरिंग से फैशन डिजाइनिंग तक: इंदौर के जितेंद्र परिहार युवाओं को दे रहे हैं प्रैक्टिकल डिज़ाइन शिक्षा

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मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के फैशन डिजाइनर और जेपी द डिजाइनर स्टूडियो एवं जेपीज़ डिजाइन अकादमी के संस्थापक जितेंद्र परिहार का मानना है कि फैशन इंडस्ट्री में सफलता केवल डिग्री से नहीं, बल्कि व्यावहारिक कौशल और निरंतर नवाचार से मिलती है। पारिवारिक सिलाई व्यवसाय से शुरुआत कर उन्होंने अपने अनुभव को आधुनिक फैशन डिजाइनिंग और प्रशिक्षण के क्षेत्र में नई पहचान दी है।

इंदौर के फैशन डिजाइनर जितेंद्र परिहार ने बताया कि उनका परिवार पीढ़ियों से सिलाई के व्यवसाय से जुड़ा रहा है, लेकिन उन्होंने पारंपरिक टेलरिंग को आधुनिक डिजाइन स्टूडियो और फैशन ब्रांड का स्वरूप देने का निर्णय लिया। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल आर्थिक सफलता नहीं, बल्कि अपनी डिजाइनिंग के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना है। इसी सोच के साथ उन्होंने जेपी द डिजाइनर स्टूडियो की स्थापना की, जहां वे विशेष रूप से इंडो-वेस्टर्न और कस्टमाइज्ड परिधानों की डिजाइनिंग करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने जेपीएस डिजाइन अकादमी शुरू की, जिसका उद्देश्य वर्षों तक चलने वाले फैशन कोर्स की प्रैक्टिकल शिक्षा कम समय में युवाओं तक पहुंचाना है।

जितेंद्र ने बताया कि फैशन इंडस्ट्री तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। शुरुआती वर्षों में उन्होंने रेडीमेड गारमेंट्स सेक्टर में काम किया, सीमित आय के बावजूद रोजाना लंबी दूरी तय की और कई कठिन परिस्थितियों का सामना किया। नोटबंदी के दौर ने उन्हें अपना व्यवसाय शुरू करने का साहस दिया और वहीं से उन्होंने खुद का टेलरिंग स्टूडियो स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने फैशन शो में अपने डिजाइन प्रस्तुत किए, जहां उनके कलेक्शन की सराहना हुई और उन्हें बड़े मंचों पर गेस्ट डिजाइनर के रूप में आमंत्रित किया गया। आज वे 30 से अधिक मॉडलों के लिए डिजाइन तैयार कर चुके हैं और फिल्मों के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग पर भी कार्य कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि फैशन इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है और अब ग्राहकों का ध्यान केवल कम कीमत पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता, कस्टमाइजेशन और सस्टेनेबल फैशन पर भी केंद्रित हो रहा है। इसी सोच के साथ वे स्क्रैप फैब्रिक और हैंड एम्ब्रॉयडरी के जरिए नए डिजाइन विकसित कर रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाला समय पर्यावरण अनुकूल फैशन का है और युवाओं को केवल डिजाइनिंग ही नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच और व्यावहारिक अनुभव भी सीखना चाहिए। इसी उद्देश्य से उनकी अकादमी नए डिजाइनर्स को उद्योग की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित कर रही है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।