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वजन घटाने की शुरुआत से ग्लोबल फिटनेस मंच तक: सिमरन ग्रोवर ने डांस और जुम्बा को बनाया अपनी पहचान

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नई दिल्ली। दिल्ली की अनुभवी कोरियोग्राफर और लाइसेंस्ड जुम्बा इंस्ट्रक्टर सिमरन ग्रोवर का मानना है कि डांस केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का सशक्त माध्यम है। वजन घटाने की व्यक्तिगत यात्रा से शुरू हुआ उनका सफर आज देश की बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों, प्रतिष्ठित संस्थानों और हजारों लोगों तक फिटनेस का संदेश पहुंचाने का माध्यम बन चुका है।

सिमरन ग्रोवर ने बताया कि बढ़ते वजन और लंबे समय तक बैठकर पढ़ाई व काम करने की दिनचर्या ने उन्हें अपनी जीवनशैली पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया। कॉलेज के दिनों में डांस सोसाइटी से जुड़ने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि डांस ही उनकी वास्तविक पहचान है। सरकारी नौकरी की तैयारी के दौरान घंटों बैठने से उनका वजन दोबारा बढ़ने लगा, जिसके बाद उन्होंने फिटनेस और डांस को एक साथ जोड़ने का फैसला किया। इसी सोच ने उन्हें जुम्बा की ओर आकर्षित किया। शुरुआत में उन्होंने बिना लाइसेंस फिटनेस क्लासें शुरू कीं, लेकिन बाद में प्रोफेशनल ट्रेनिंग लेकर लाइसेंस्ड जुम्बा इंस्ट्रक्टर बनीं। आज वे गूगल ऑफिस, अशोक होटल सहित 500 से अधिक कॉर्पोरेट संस्थानों में फिटनेस सेशन दे चुकी हैं।

सिमरन ने कहा कि डांस केवल शरीर को फिट नहीं रखता, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी मजबूत बनाता है। उनके अनुसार डांस व्यक्ति के मन और शरीर के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करता है, जिससे आत्मविश्वास, ऊर्जा और सकारात्मक सोच विकसित होती है। अब तक वे एक हजार से अधिक लोगों को कोरियोग्राफी सिखा चुकी हैं, जिनमें वेडिंग परफॉर्मेंस, स्टेज शो और कॉर्पोरेट इवेंट्स शामिल हैं। इसके अलावा वे बॉलीवुड कलाकारों को भी ट्रेनिंग देती हैं। उनका कहना है कि जुम्बा ने उन्हें केवल पेशेवर सफलता ही नहीं दी, बल्कि जीवन को हमेशा सकारात्मक और उत्साहपूर्ण बनाए रखने की प्रेरणा भी दी।

उन्होंने बताया कि परिवार के सहयोग और प्रेरणा के कारण ही वह आगे बढ़ पाईं, उसके बाद उन्होंने अपने जुनून को ही पेशा बनाया और आज उसी निर्णय पर गर्व महसूस करती हैं। सिमरन का सपना है कि आने वाले वर्षों में उनकी पहचान केवल भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिष्ठित फिटनेस और डांस विशेषज्ञ के रूप में बने। उनका मानना है कि सफलता का वास्तविक अर्थ केवल ऊंचाई तक पहुंचना नहीं, बल्कि विनम्रता बनाए रखते हुए अपने व्यवहार और काम से लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है।

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चंचल गोयल, अभिभावक, ग्वालियर, एमपी

मैंने अपने 15 साल के शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव के आधार पर देखा है कि प्राइमरी टीचर्स की बॉन्डिंग बच्चों के साथ बहुत अच्छी होती है।  यह उम्र के बच्चे अपने टीचर्स को फॉलो करते हैं और पेरेंट्स से भी लड़ जाते हैं। इसलिए, स्कूल और टीचर्स पर बड़ी जिम्मेदारी होती है कि वे बच्चों को खुश रखें।

अगर बच्चा अच्छा परफॉर्म करने लगे, तो पेरेंट्स उसे अपना हक मान लेते हैं। पेरेंट्स को विश्वास करना चाहिए कि जिस स्कूल में उन्होंने दाखिला कराया है, वह बच्चों के लिए सही है। लेकिन अपने बच्चों का रिजल्ट किसी और के बच्चे से कंपेयर नहीं करना चाहिए। आजकल के पेरेंट्स समझदार हैं और जानते हैं कि बच्चों को कैसी शिक्षा देनी है। किसी भी समस्या के लिए वे सीधे टीचर से बात कर सकते हैं, जिससे समस्या का समाधान जल्दी हो सके।

प्रियंका जैसवानी चौहान, हेड मिस्ट्रेस, बिलाबोंग हाई इंटरनेशनल स्कूल, ग्वालियर, एमपी

जुलाई का सत्र बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह सबसे बड़ा वेकेशन होता है।  पेरेंट्स को बच्चों की लास्ट सेशन की पढ़ाई का रिवीजन कराना चाहिए ताकि वे आउट ऑफ रेंज न हो जाएं। शुरुआती अध्याय बच्चों की रुचि को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते हैं।

आगे वे कहते हैं कि प्रेशर का नेगेटिव और पॉजिटिव दोनों प्रभाव होते हैं। आज की युवा पीढ़ी में 99% लोग बिजनेस और स्टार्टअप्स शुरू कर रहे हैं। पढ़ाई को लेकर बच्चों पर दबाव डालना गलत है, लेकिन भविष्य के लिए यह लाभदायक हो सकता है। बच्चों को गैजेट्स का सही उपयोग आना चाहिए, लेकिन उन पर पूर्णतः निर्भर होना गलत है।

तुषार गोयल, एचओडी इंग्लिश, बोस्टन पब्लिक स्कूल, आगरा, यूपी

वेकेशंस के दौरान बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह नहीं हटानी चाहिए। स्कूल द्वारा दिए गए प्रोजेक्ट्स को धीरे-धीरे  करने से पढ़ाई का दबाव नहीं बनता। जब पढ़ाई फिर से शुरू होती है, तो बच्चों को अधिक दबाव महसूस नहीं होता। आजकल स्कूल बहुत मॉडर्नाइज हो गए हैं जिससे बच्चों को हेल्दी एटमॉस्फियर और खेल-खेल में सीखने को मिलता है।

एडमिनिस्ट्रेशन को बुक्स का टाइम टेबल सही तरीके से बनाना चाहिए ताकि बच्चों पर वजन कम पड़े। स्कूल में योग और एक्सरसाइज जैसी गतिविधियाँ भी शुरू होनी चाहिए ताकि बच्चे फिट रहें और उन्हें बैक प्रेशर न हो। टीचर और पेरेंट्स के बीच का कम्यूनिटेशन गैप काम होना चाहिए। बच्चों का एडमिशन ऐसे स्कूल में करें जिसका रिजल्ट अच्छा हो, भले ही उसका नाम बड़ा न हो।

डॉ. नेहा घोडके, अभिभावक, ग्वालियर, एम

बच्चों को पढ़ाई की शुरुआत खेलते-कूदते करनी चाहिए ताकि उन्हें बोझ महसूस न हो। पेरेंट्स की अपेक्षाएं आजकल बहुत बढ़ गई हैं,  लेकिन हर बच्चा समान नहीं होता। बच्चों को अत्यधिक दबाव में न डालें, ताकि वे कोई गलत कदम न उठाएं। वे आगे कहती हैं कि आजकल बच्चे दिनभर फोन का उपयोग करते रहते हैं, और पेरेंट्स उन्हें फोन देकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। पेरेंट्स को बच्चों पर ध्यान देना चाहिए और उन्हें कम से कम समय के लिए फोन देना चाहिए।

दीपा रामकर, टीचर, माउंट वर्ड स्कूल, ग्वालियर, एमपी

हमारे स्कूल में पारदर्शिता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल के समय में पेरेंट्स अपने काम में व्यस्त रहते हैं और बच्चों की पढ़ाई पर समय कम दे पाते हैं। स्कूल द्वारा टेक्नोलॉजी की मदद से बच्चों का होमवर्क पेरेंट्स तक पहुँचाया जाता है ताकि वे बच्चों पर ध्यान दे सकें।

पेरेंट्स को बच्चों को गैजेट्स देते वक्त ध्यान रखना चाहिए की वह उसका कितना इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्हें मोबाइल का कम से कम उपयोग करने देना चाहिए। अगर आप अपने बच्चों के सामने बुक रीड करेंगे तो बच्चा भी बुक रीड करने के लिए प्रेरित होगा।

दीक्षा अग्रवाल, टीचर, श्री राम सेंटेनियल स्कूल, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।

अंकिता राणा, टीजीटी कोऑर्डिनेटर, बलूनी पब्लिक स्कूल, दयालबाग, आगरा, यूपी

वर्तमान समय में बच्चों को पढ़ाने की तकनीक में बदलाव आया है, आजकल थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल बेस्ड लर्निंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। आजकल पेरेंट्स भी पहले से बेहद अवेयर हैं, क्योंकि अब बच्चों के करियर पॉइंट ऑफ व्यू से कई विकल्प हमारे सामने होते हैं जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के साथ प्रॉपर कम्युनिकेट करें।