भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से संचालित हैंडलूम ब्रांड रस्टिकब्लिस हैंडलूम की संस्थापक वाग्मिता प्रज्ञा भारतीय हस्तकरघा, पारंपरिक बुनाई और विलुप्त होती लोककलाओं को नई पहचान देने का काम कर रही हैं। कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन, सिम्बायोसिस पुणे से एमबीए और बैंकिंग क्षेत्र में छह वर्षों के सफल करियर के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया छोड़कर भारतीय हस्तशिल्प और बुनकरों के सशक्तिकरण को अपना जीवन उद्देश्य बना लिया।
वाग्मिता प्रज्ञा ने बताया कि वर्ष 2019 में उन्होंने रस्टिकब्लिस हैंडलूम की शुरुआत इस उद्देश्य से की कि भारत के विभिन्न राज्यों की दुर्लभ और पारंपरिक हैंडलूम बुनाई को एक मंच पर लाया जा सके। मूल रूप से बिहार से होने के कारण उनका विशेष फोकस भागलपुरी सिल्क और विश्वप्रसिद्ध मधुबनी (मिथिला) कला को बढ़ावा देने पर रहा। उनके संग्रह में मध्य प्रदेश की चंदेरी और माहेश्वरी साड़ियां, कर्नाटक की दुर्लभ बुनाई सहित कई राज्यों की पारंपरिक विरासत शामिल है। प्राकृतिक रंगों, हस्तनिर्मित तकनीकों और पारंपरिक शिल्प के जरिए तैयार होने वाली प्रत्येक साड़ी को बनाने में लगभग 25 से 30 दिन का समय लगता है, जिसमें महिला कलाकारों और बुनकर परिवारों की मेहनत शामिल रहती है।
वाग्मिता ने बताया कि इस पहल की प्रेरणा उन्हें बिहार के नालंदा क्षेत्र के उन गांवों से मिली, जहां हर घर में करघे चलते हैं, लेकिन बुनकरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। उन्होंने महसूस किया कि बिचौलियों के कारण हजारों रुपये मूल्य की साड़ियों के बदले कारीगरों को बेहद कम भुगतान मिलता है। इसी अनुभव ने उन्हें सीधे बुनकरों के साथ काम करने और उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि यदि कारीगरों को सम्मानजनक आय नहीं मिलेगी तो देश की सदियों पुरानी हस्तकरघा परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। इसलिए सरकार, समाज और उपभोक्ताओं—तीनों को मिलकर इस विरासत को बचाने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे।
उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति और हैंडलूम की ओर फिर से आकर्षित हो रही है। सोशल मीडिया और बदलते फैशन ट्रेंड्स के कारण पारंपरिक साड़ियों को आधुनिक अंदाज में अपनाने का चलन बढ़ा है। वाग्मिता का मानना है कि भारतीय हस्तशिल्प केवल पहनावे का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान और लाखों कारीगर परिवारों की आजीविका भी है। यही कारण है कि उनका लक्ष्य भारतीय हैंडलूम को देश ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाना और अधिक से अधिक युवाओं को इस विरासत से जोड़ना है।





